भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) कीटो वान्यतमस्तप्तः कृष्णसर्पप्रियङ्गुभिः ।
शोषयेदेष संयोगः सद्यः प्राणहरो मतः ॥
(२) धामार्गवयातुधानमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तमार्धमासिकः ।
(३) व्याघातकमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तं कीटयोगो मासिकः । कला-
मात्रं पुरुषाणां द्विगुणं खराश्वानां चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ।
(४) शतकर्दमोच्चिट्टिङ्गकरवीरकटुतुम्बीमत्स्यधूमो मदनकोद्रवपला-
लेन हस्तिकर्णपलाशपलालेन वा प्रवातानुवाते प्रणीतो यावच्चरति तावन्मा-
रयति ।
(५) पूतिकीटमत्स्यकटुतुम्बीशतकर्दमेध्मेन्द्रगोपचूर्णं पूतिकीपक्षद्रा-
रालाहेमविदारीचूर्णं वा बस्तशृङ्गखुरचूर्णयुक्तमन्धीकरो धूमः ।


(इछ्म), गिरगिट (कृकलास), छिपकली (गृहगोधिका), अंधा या विषरहित साँप (अंधाहिक), जंगली तीतर (कृकण), पूतिकीट नामक कीड़ा तथा गोमारिका नामक औषधि, इन सब का चूर्ण मिलाया जाय तो उसका धुआँ तत्काल ही प्राणान्त कर देता है।

(१) उक्त कीड़ों में से किसी भी एक को यदि आग में तपाकर सूंघ लिया जाय तो उससे शरीर सूख जाता है। यदि काले साँप को कागुन के साथ मिलाकर उसका धुआँ किया जाय तो वह भी तत्काल प्राणांत कर डालता है।

(२) यदि कड़वी तोरई और यातुधान नामक औषधि की जड़ों को भिलावा के फूलों के चूर्ण के साथ मिला लिया जाय तो वह योग पंद्रह दिन में ही प्राण ले लेता है।

(३) यदि अमलतास की जड़ को भिलावे के पुष्पचूर्ण के साथ मिलाकर उसमें पूर्वोक्त किसी तपे हुए कीड़े का योग कर दिया जाय तो उसका प्रयोग एक मास में प्राण हर लेता है। इस कीटयोग की मात्रा मनुष्य को एक कला, गधे को उससे दुगुना और हाथी-ऊटों को उसका चौगुना देना चाहिए।

(४) शतावरी, कर्दम (अगर, तगर, केसर, कस्तूरी, कुंकुम और कपूर का पीसा हुआ लेप), उच्चिटिंग (बिच्छू ?), कनेर, कडवी तुंबी और मछली, इसका धुआँ; अथवा धतूरा, कोदो और धान के पुआल के साथ, अथवा धनिया, ढाक तथा पुआल के साथ धुआँ किया जाय और उसको तेज हवा में रख दिया जाय तो जहाँ तक वह जायगा वहाँ तक के प्राणियों को मार डालेगा।

(५) पूतिकीट (पात बिच्छी), मछली, कड़वी तूंबी, शतावरी, कर्दम, ढाक की लकड़ी और इंद्रगोप (बीर बहूटी), इन सबका चूर्ण; अथवा पूतिकीट, कटेरी, राल, धतूरा और विदारी कंद इन सबका चूर्ण यदि बकरे के सींग और खुर के चूर्ण के साथ मिला दिया जाय तो उनका धुआँ अंधा बना देता है।