कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 844, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १७९ | स्वबलोपघातप्रतीकारः |
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| अध्याय ४ |
(१) स्वपक्षे परप्रयुक्तानां दूषिविषगराणां प्रतीकारे श्लेष्मातककपित्थदन्तिदन्तशठगोजीशिरीषपाटलीबलास्योनाकपुनर्नवाश्वेतावरणक्वाथयुक्तं चन्दनसालावृकीलोहितयुक्तं तेजनोदकं राजोपभोग्यानां गुह्यप्रक्षालनं स्त्रीणां सेनायाश्च विषप्रतीकारः ।
(२) पृषतनकुलनीलकण्ठगोधापित्तयुक्तं मषीराजिचूर्णं सिन्दुवारितवरणवारणीतण्डुलीयकशत्पर्वाग्रपिण्डीतकयोगो मदनदोषहरः ।
(३) शृगालविन्नामदनसिन्दुवारितवरणवारणवल्लीमूलकषायाणामन्यतमस्य समस्तानां वा क्षीरयुक्तं पानं मदनदोषहरम् ।
शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार
( १ ) शत्रु द्वारा किये गये दूषक तथा विष आदि के घातक प्रयोगों का प्रतीकार इस प्रकार करना चाहिए : लहसोड़ा ( श्लेष्मातक ), कैथा ( कपित्थ ), जमालघोटा ( दंती ); जम्भीरी नीबू ( दंतशठ ), गोभी ( गोजी ); सिरस ( शिरीष ), काली पाढरी या पाटल ( पाटली ), खरैंटी ( बला ), सोनापाठा ( स्योनाक ); पुनर्नवा, शराव और वरनावृक्ष का काढ़ा बना कर चंदन, सालावृकी ( बंदरिया या सियारिन या कुतिया ) के खून से सानकर बांस के पानी ( तेजनोदक ) से राजा के उपयोग में आने वाली स्त्रियों की योनि, स्तन आदि गुप्तांगों को साफ कराया जाय और सेना में प्रयुक्त विष का प्रतीकार किया जाय ।
( २ ) दागीमृग ( पृषतन ), नेवला, मोर और गोह के पित्ते को काले संभालू ( मषी ) तथा राई के चूर्ण में मिलाकर बनाये गये योग से पागल बना देने वाले विषों का प्रतीकार किया जाय । संभालू, बरना, दूब ( बारुणी ), चौलाई, बाँस का अग्रभाग ( शतपर्वाग्र ) और मैनफल, इन सब चीजों का योग भी उन्मादजन्य दोषों का उपशमन करने वाला होता है ।
( ३ ) शृगालविन्ना औषधि, धतूरा ( मदन ), संभालू ( सिंधुवारित ), बरना ( वरण ) और गजपीपल ( वारणवल्लीमूल ) इन सबकी जड़ों को मिलाकर अथवा उनका अलग-अलग काढा, दूध के साथ पीने से उन्माद पैदा करने वाले विषयोगों को शांत कर देता है ।