कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
(१) तूर्याणां तैः प्रलिप्तानां शब्दो विषविनाशनः ।
लिप्तध्वजं पताकां वा दृष्ट्वा भवति निर्विषः ॥
(२) एतैः कृत्वा प्रतीकारं स्वसैन्यानामथात्मनः ।
अमित्रेषु प्रयुञ्जीत विषधूमाम्बुदूषणान् ॥
इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे स्वबलोपघातप्रतीकारो नाम चतुर्थोऽध्यायः;
आदितोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
समाप्तमिदमौपनिषदिकं चतुर्दशमधिकरणम् ।
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(१) गिलोय आदि औषधियों से चुपड़े गये वाद्यों का शब्द विष को नष्ट करने वाला होता है । इसी प्रकार इन्हीं औषधियों से लिप्त ध्वजाओं को देखकर भी विष का प्रभाव जाता रहता है ।
(२) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार की औषधियों द्वारा वह अपनी सेना की तथा अपनी रक्षा करके विषैले धुंए का और विषाक्त पानी का प्रयोग सदा अपने शत्रुओं पर करता रहे ।
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में स्वबलोपघातप्रतीकार नामक चौथा अध्याय समाप्त
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