कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 859, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्य-प्रणीत सूत्र
सुखस्य मूलं धर्मः ॥ १ ॥ धर्मस्य मूलमर्थः ॥ २ ॥ अर्थस्य मूलं राज्यम् ॥ ३ ॥ राज्यमूलमिन्द्रियजयः ॥ ४ ॥ इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ॥ ५ ॥ विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा ॥ ६ ॥ वृद्धसेवाया विज्ञानम् ॥ ७ ॥ विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत् ॥ ८ ॥ सम्पादितात्मा जितात्मा भवति ॥ ९ ॥ जितात्मा सर्वार्थैः संयुज्येत ॥ १० ॥ अर्थसम्पत्प्रकृतिसम्पदं करोति ॥११॥ प्रकृतिसम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ॥ १२ ॥ प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान् ॥ १३ ॥
अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान् ॥ १४ ॥ सम्पाद्यात्मानमन्विच्छेत् सहायवान् ॥ १५ ॥ नासहायस्य मन्त्रनिश्चयः ॥ १६ ॥ नैकं चक्रं परिभ्रमयति ॥ १७ ॥ सहायः समसुखदुःखः ॥ १८ ॥
मानी प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् ॥ १९ ॥ अविनीतं स्नेहमात्रेण न मन्त्रे कुर्वीत ॥ २० ॥ श्रुतवन्तमुपधाशुद्धं मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ २१ ॥ मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः ॥ २२ ॥ मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति
सुख का मूल धर्म है ॥ १ ॥ धर्म का मूल अर्थ है ॥ २ ॥ अर्थ का मूल राज्य है ॥ ३ ॥ राज्य का मूल इन्द्रियजय है ॥ ४ ॥ इन्द्रियजय का मूल विनय ( नम्रता ) है ॥ ५ ॥ विनय का मूल वृद्धों की सेवा है ॥ ६ ॥ वृद्धों की सेवा का मूल विज्ञान है ॥ ७ ॥ इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को विज्ञान से सम्पन्न बनाए ( आत्मोन्नति करे ) ॥ ८ ॥ जो पुरुष विज्ञान से सम्पन्न होता है वह स्वयं को भी जीत सकता है ॥ ९ ॥ अपने ऊपर काबू पाने वाला मनुष्य समस्त अर्थों से सम्पन्न होता है ॥ १० ॥ अर्थ-सम्पत्ति अमात्य आदि प्रकृति सम्पत्ति को देने वाली होती है ॥ ११ ॥ प्रकृति-सम्पत्ति, के द्वारा नेता-रहित राज्य का भी संचालन किया जा सकता है ॥ १२ ॥ अमात्य आदि का कोप सब कोपों में बड़ा होता है ॥ १३ ॥
अविनीत स्वामी के प्राप्त होने की अपेक्षा, स्वामी का न मिलना श्रेयस्कर है ॥ १४ ॥ अपने आपको सर्व-सम्पन्न बना लेने के बाद ही सहायकों की इच्छा करनी चाहिए ॥ १५ ॥ सहायकहीन व्यक्ति के विचार अनिश्चित होते हैं ॥ १६ ॥ एक पहिये से गाड़ी को नहीं चलाया जा सकता ॥ १७ ॥ सहायक वही है, जो अपने सुख-दुःख में सदा साथ रहे ॥ १८ ॥
मनस्वी राजा को चाहिए कि वह, अपने समान दूसरे मनस्वी व्यक्ति को ही अपना सलाहकार नियुक्त करे ॥ १९ ॥ विनयहीन व्यक्ति को, एकमात्र स्नेह के कारण, कभी भी सलाह के समय सम्मिलित नहीं करना चाहिए ॥ २० ॥ बहुश्रुत एवं सब तरह से परीक्षित व्यक्ति को ही मन्त्री नियुक्त करना चाहिए ॥ २१ ॥ समस्त