कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणाधिकरण-विभाजन ३
॥ २० ॥ शुल्काध्यक्षः ॥ २१ ॥ सूत्राध्यक्षः ॥ २२ ॥ सीताध्यक्षः ॥२३॥ सुराध्यक्षः ॥ २४ ॥ सूनाध्यक्षः ॥ २५ ॥ गणिकाध्यक्षः ॥ २६ ॥ नावध्यक्षः ॥ २७ ॥ गोऽध्यक्षः ॥ २८ ॥ अश्वाध्यक्षः ॥ २९ ॥ हस्त्यध्यक्षः ॥ ३० ॥ रथाध्यक्षः ॥ ३१ ॥ पत्त्यध्यक्षः ॥३२॥ सेनापतिप्रचारः ॥३३॥ मुद्राध्यक्षः ॥ ३४ ॥ विवीताध्यक्षः ॥ ३५ ॥ समाहर्तृप्रचारः ॥ ३६ ॥ गृहपतिवैदेहकतापसव्यञ्जनाः प्रणिधयः ॥३७॥ नागरिकप्रणिधिः ॥३८॥
इत्यध्यक्षप्रचारो द्वितीयमधिकरणम् ।
(१) व्यवहारस्थापना ॥ १ ॥ विवादपदनिबन्धः ॥ २ ॥ विवाहसंयुक्तम् ॥ ३ ॥ दायविभागः ॥ ४ ॥ वास्तुकम् ॥ ५ ॥ समयस्यानपाकर्म ॥ ६ ॥ ऋणादानम् ॥ ७ ॥ औपनिधिकम् ॥ ८ ॥ दासकर्मकरकल्पः ॥ ९ ॥ संभूयसमुत्थानम् ॥ १० ॥ विक्रीतक्रीतानुशयः ॥ ११ ॥ दत्तस्यानपाकर्म ॥ १२ ॥ अस्वामिविक्रयः ॥ १३ ॥ स्वस्वामिसंबन्धः ॥ १४ ॥ साहसम् ॥ १५ ॥ वाक्पारुष्यम् ॥ १६ ॥ दण्डपारुष्यम् ॥ १७ ॥ द्यूतसमाह्वयम् ॥ १८ ॥ प्रकीर्णकानि ॥ १९ ॥
इति धर्मस्थीयं तृतीयमधिकरणम् ।
(२) कारुकरक्षणम् ॥ १ ॥ वैदेहकरक्षणम् ॥ २ ॥ उपनिपातप्रतीकारः
१६. तोल-माप का निश्चय; २०. देश और काल का मान; २१. शुल्क का अध्यक्ष; २२. सूत का अध्यक्ष; २३. कृषि का अध्यक्ष; २४. आबकारी का अध्यक्ष; २५. वधस्थान का अध्यक्ष; २६. वेश्यालयों का अध्यक्ष; २७. परिवहन का अध्यक्ष; २८. पशुओं का अध्यक्ष; २९. अश्वशाला का अध्यक्ष; ३०. गजशाला का अध्यक्ष; ३१. रथसेना का अध्यक्ष; ३२. पैदल सेना का अध्यक्ष; ३३. सेनापति का कार्य; ३४. मुद्रा-विभाग का अध्यक्ष; ३५. चरागाह का अध्यक्ष; ३६. समाहर्त्ता का कार्य; ३७. गृहपति, वैदेहक तथा तापस के वेष में गुप्तचर; और ३८. नागरिक के कार्य ।
तीसरा अधिकरण : न्याय का निरूपण
(१) १. व्यवहार की स्थापना; २. विवाद पदों का विचार; ३. विवाह-सम्बन्धी विचार; ४. दाय-विभाग; ५. वास्तुक; ६. समय (प्रतिज्ञा) का न छोड़ना; ७. ऋण लेना; ८. धरोहर-सम्बन्धी नियम; ९. दास और श्रमिकों के नियम; १०. साझेदारी का हिस्सा; ११. क्रय-विक्रय-सम्बन्धी बयाना; १२. देने का वचन देकर फिर न देना; १३. अस्वामि-विक्रय; १४. स्व-स्वामि-सम्बन्ध; १५. साहस; १६. वाक्पारुष्य; १७. दण्डपारुष्य; १८. द्यूत-समाह्वय; और १९. प्रकीर्णक ।
चौथा अधिकरण : कण्टक-शोधन
(२) १. शिल्पियों से देश की रक्षा; २. व्यापारियों से देश की रक्षा; ३. दैवी