भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 884

८०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र

सुदर्शना हि राजानः प्रजा रञ्जयन्ति ॥ ५५८ ॥ न्याययुक्तं राजानं मातरं मन्यन्ते प्रजाः ॥ ५५९ ॥ तादृशः स राजा इह सुखं ततः स्वर्गमाप्नोति ॥ ५६० ॥

अहिंसालक्षणो धर्मः ॥ ५६१ ॥ स्वशरीरमपि परशरीरं मन्यते साधुः ॥ ५६२ ॥ मांसभक्षणमयुक्तं सर्वेषाम् ॥ ५६३ ॥

न संसारभयं ज्ञानवताम् ॥ ५६४ ॥ विज्ञानदीपेन संसारभयं निवर्तते ॥ ५६५ ॥

सर्वमनित्यं भवति ॥ ५६६ ॥ कृमिशकृन्मूत्रभाजनं शरीरं पुण्यपापजन्महेतुः ॥ ५६७ ॥ जन्ममरणादिषु दुःखमेव ॥ ५६८ ॥

तेभ्यस्तर्तुं प्रयतेत ॥ ५६९ ॥ तपसा स्वर्गमाप्नोति ॥ ५७० ॥ क्षमायुक्तस्य तपो विवर्धते ॥ ५७१ ॥ तस्मात् सर्वेषां कार्यसिद्धिर्भवति ॥ ५७२ ॥

इति चाणक्यसूत्राणि — : ० : —


राजाओं के दर्शन, प्रजा को कठिनाई से प्राप्त होते हैं उसकी प्रजा नष्ट हो जाती है ॥ ५५७ ॥

जो राजा बराबर प्रजा के सुख-दुःख को सुनते हैं उनसे प्रजा प्रसन्न रहती है ॥ ५५८ ॥ न्यायपरायण राजा को, प्रजा माता के समान मानती है ॥ ५५९ ॥ इस प्रकार का प्रजाप्रिय राजा ऐहिक सुख और पारलौकिक स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥ ५६० ॥

अहिंसा ही धर्म है ॥ ५६१ ॥ सज्जन पुरुष अपने शरीर को भी पराया ही मानते हैं ॥ ५६२ ॥ मांस-भक्षण सबके लिए अनुचित है ॥ ५६३ ॥ ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता ॥ ५६४ ॥ विज्ञान ( ब्रह्मज्ञान ) के दीपक से संसार-भय भाग जाता है ॥ ५६५ ॥

यह दिखायी देने वाला सब कुछ अनित्य है ॥ ५६६ ॥ कृमि-कीट तथा मल-मूत्र का घर शरीर पुण्य-पाप का जन्मस्थल है ॥ ५६७ ॥ यह जन्म-मरण आदि दुःख ही दुःख है ॥ ५६८ ॥

इस जन्म-मरणादि से छुटकारा पाने का उपाय करना चाहिए ॥ ५६९ ॥ सब से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥ ५७० ॥ क्षमाशील पुरुष का तप बढ़ता रहता है ॥ ५७१ ॥ तपश्चर्या से सबके कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ५७२ ॥

चाणक्यसूत्र समाप्त

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