कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १ | # त्रयीस्थापना |
|---|---|
| अध्याय २ |
(१) सामर्ग्यजुर्वेदास्त्रयस्त्रयी । अथर्ववेदेतिहासवेदौ च वेदाः । शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोविचितिज्योतिषमिति चाङ्गानि ।
(२) एष त्रयीधर्मश्चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां च स्वधर्मस्थापनादौपकारिकः ।
(३) स्वधर्मो ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यजनं याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति । क्षत्रियस्याध्ययनं यजनं दानं शस्त्राजीवो भूतरक्षणं च । वैश्यस्याध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपाल्ये वणिज्या च । शूद्रस्य द्विजातिशुश्रूषा वार्त्ता कारुकुशीलवकर्म च ।
(४) गृहस्थस्य स्वकर्माजीवस्तुल्यैरसमानर्षिभिर्विवाह्यमृतुगामित्वं देवपित्रतिथिभृत्येषु त्यागः शेषभोजनं च ।
(५) ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायोऽग्निकार्याभिषेकौ भैक्षव्रतत्वमाचार्ये प्राणान्तिकी वृत्तिस्तदभावे गुरुपुत्रे सब्रह्मचारिणि वा ।
विद्या-विषयक विचार : त्रयी
(१) साम, ऋक् तथा यजु, इन तीनों वेदों का समन्वित नाम ही त्रयी (तीनों वेद) है । अथर्ववेद और इतिहासवेद ही वेद कहे जाते हैं । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दोविचिति (विचिति=विचार, विवेक) और ज्योतिष, ये छह वेदांग हैं ।
(२) त्रयी में निरूपित यह धर्म, चारों वर्णों और चारों आश्रमों को अपने-अपने धर्म (कर्त्तव्य) में स्थिर रखने के कारण लोक का बहुत ही उपकारक है ।
(३) ब्राह्मण का धर्म अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ-याजन और दान देना तथा दान लेना है । क्षत्रिय का धर्म है पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, शस्त्रबल से जीविकोपार्जन करना और प्राणियों की रक्षा करना । वैश्य का धर्म पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना; कृषिकार्य एवं पशुपालन और व्यापार करना है । इसी प्रकार शूद्र का अपना धर्म है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य की सेवा करे; खेती, पशु-पालन तथा व्यापार करे; और शिल्प (कारीगरी), गायन, वादन एवं चारण, भाट आदि का कार्य करे ।
(४) गृहस्थ अपनी परम्परा के अनुकूल कार्यों द्वारा जीविकोपार्जन करे; सगोत्र तथा असगोत्र समाज में विवाह करे; ऋतुगामी हो; देव, पितर, अतिथि और भृत्यजनों को देकर सबसे अन्त में भोजन करे ।
(५) ब्रह्मचारी का धर्म है कि वह नियमित स्वाध्याय करे; अग्निहोत्र रचे; नित्य