कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १ | अध्याय ३
वार्तादण्डनीतिस्थापना
(१) कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता । धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टि-प्रदानादौपकारिकी । तया स्वपक्षं परपक्षं च वशीकरोति कोशदण्डाभ्याम् ।
(२) आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः । तस्य नीति-र्दण्डनीतिः । अलब्धलाभार्था; लब्धपरिरक्षणी; रक्षितविवर्धनी; वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ।
(३) तस्यामायत्ता लोकयात्रा । तस्माल्लोकयात्रार्थी नित्यमुद्यतदण्डः स्यात् । न ह्येवंविधं वशोपनयनमस्ति भूतानां यथा दण्ड इत्याचार्याः ।
(४) नेति कौटिल्यः । तीक्ष्णदण्डो हि भूतानामुद्वेजनीयः । मृदुदण्डः परिभूयते । यथार्हदण्डः पूज्यः । सुविज्ञातप्रणीतो हि दण्डः प्रजा धर्मार्थ-कामैर्योजयति ।
विद्या-विषयक विचार : वार्ता और दण्डनीति
( १ ) कृषि, पशुपालन और व्यापार, ये वार्ताविद्या के विषय हैं । यह विद्या, धान्य, पशु, हिरण्य, ताम्र आदि खनिज पदार्थ और नौकर-चाकर आदि की देने वाली परम उपकारिणी है । इसी विद्या से उपार्जित कोश और सेना के बल पर राजा स्वपक्ष तथा परपक्ष को वश में कर लेता है ।
( २ ) आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन सभी विद्याओं की सुख-समृद्धि दण्ड पर निर्भर है । दण्ड ( शासन ) को प्रतिपादित करने वाली नीति ही दण्डनीति कह-लाती है । वही अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त कराती है; प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करती है; रक्षित वस्तुओं की वृद्धि करती है और वही संवर्द्धित वस्तुओं को समुचित कार्यों में लगाने का निर्देश करती है । उसी पर संसार की सारी लोकयात्रा निर्भर है । इस-लिए लोक को समुचित मार्ग पर ले चलने की इच्छा रखने वाला राजा सदा ही उद्यतदण्ड ( दण्ड देने के लिए प्रस्तुत ) रहे ।
( ३ ) पुरातन आचार्यों का अभिमत है कि 'दण्ड के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है, जिससे सभी प्राणियों को सहज ही वश में किया जा सके' ।
( ४ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य इस युक्ति से सहमत नहीं हैं । उनका कहना है कि 'कठोर दण्ड देने वाले राजा ( निष्ठुर शासक ) से सभी प्राणी उद्विग्न हो उठते