कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२३ उत्तरकाण्ड उद्बोधन सुनु कान दिएँ, नित नेमु लिएँ रघुनाथहिके गुनगाथहि रे । सुखमंदिर सुंदर रूपु सदा उर आनि धरें धनु-भाथहि रे ॥ रसना निसि-बासर सादर सों तुलसी ! जपु जानकीनाथहि रे । करु संग सुसील सुसंतन सों, तजि क्रूर, कुपंथ, कुसाथहि रे ।२९। हे तुलसीदास ! नित्य नियमपूर्वक कान ( ध्यान ) देकर श्रीरघुनाथजीकी गुणगाथा श्रवण करो । सुखके स्थान, धनुष और तरकस धारण किये हुए ( श्रीरामचन्द्रजीके ) सुन्दर स्वरूपका ही सदा स्मरण करो और जिह्वासे रात-दिन आदरपूर्वक श्रीजानकी- नाथका ही नाम जपो । सुशील और संत पुरुषोंका सङ्ग करो, एवं कपटी पुरुष, कुपंथ और कुसङ्गको त्याग दो । सुत, दार, अगारु, सखा, परिवारु विलोकु महा कुसमाजहि रे । सबकी ममता तजि कै, समता सजि, संतसभाँ न विराजहि रे ॥ नरदेह कहा, करि देखु विचारु, बिगारु गँवार न काजहि रे । जनि डोलहि लोलुप कूकुरु ज्यों, तुलसी भजु कोसलराजहि रे ३० पुत्र, कलत्र, घर, मित्र, परिवार—इन सबको महाकुसमाज समझो; सबकी ममता त्याग कर, समता धारणकर संतोंकी सभामें नहीं विराजता ? यह नरदेह क्या है, जरा विचारकर देखो । तुलसीदासजी ( अपने ही लिये ) कहते हैं—अरे गँवार ! कामको न बिगाड़ । लालची कुत्तेकी तरह ( इधर-उधर ) न भटक, कोसलराज ( श्रीरामचन्द्र ) का भजन कर । विषया परनारि निसा-तरुनाई सो पाइ परचो अनुरागहिं रे । जमके पहरू दुख, रोग, बियोग बिलोकत हू न बिरागहि रे ॥