भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

१२५ उत्तरकाण्ड जो भजै भगवानु सयान सोई, 'तुलसी' हठ चातकु ज्यों गहि कै। नतु और सबै बिषबीज बए, हर हाटक कामदुहा नहि कै ॥३३॥ भारतवर्षकी पवित्र भूमि है, उत्तम (आर्य) कुलमें जन्म हुआ है, समाज और शरीर भी उत्तम मिला है। गोसाईंजी कहते हैं—ऐसी अवस्थामें जो पुरुष क्रोध और कठोर वचन त्याग कर वर्षा, जाड़ा, वायु और घामको सहन करते हुए चातक- के समान हठपूर्वक सर्वदा भगवान्‌को भजता है, वही चतुर है; अन्यथा और सब तो सुवर्णके हलमें कामधेनुको जोतकर (केवल) विष-बीज बोते हैं। सो सुकृती सुचिमंत सुसंत, सुजान सुसीलसिरोमनि स्वै। सुर-तीरथ तासु मनावत आवत, पावन होत हैं तातनु छ्वै ॥ गुनगेहु सनेहको भाजनु सो, सब ही सों उठाइ कहौं भुज द्वै। सतिभायँ सदा छल छाडि सबै 'तुलसी' जो रहै रघुबीरको है ॥३४॥ तुलसीदासजी कहते हैं—मैं दोनों भुजाएँ उठाकर सभीसे कहता हूँ—जो (पुरुष) सब प्रकारके छल छोड़कर सच्चे भावसे श्रीरघुनाथजीका हो रहता है, वही पुण्यात्मा, पवित्र, साधु, सुजान और सुशीलशिरोमणि है; देवता और तीर्थ उसके मनाते ही आ जाते हैं और उसके शरीरका स्पर्श कर स्वयं भी पवित्र हो जाते हैं तथा वह सभी प्रकारके गुणोंका आकर और सबका स्नेहभाजन हो जाता है। विनय सो जननी, सो पिता, सोइ भाइ, सो भामिनि, सो सुतु, सो हितु मेरो सोइ सगो, सो सखा, सोइ सेवकु, सो गुरु, सो सुरु, साहेबु, चेरो ॥ सो 'तुलसी' प्रिय प्रानसमान, कहाँ लौं बनाइ कहौं बहुतेरो ।