कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२११ . उत्तरकाण्ड महादेवजी ! आप श्रीरघुनाथजीका शील-स्वभाव और हमारा स्नेह- सम्बन्ध तो जानते ही हैं; मैं श्रीरामचन्द्रजीसे ही डरता हूँ। हे भूतनाथ ! मेरे इस आधिभौतिक शरीरमें बड़ी प्रबल पीड़ा हो रही है, इससे तुलसीदास बहुत व्याकुल है; इस कुत्सित पीड़ासे मैं घुला जाता हूँ, आप रक्षा कीजिये। इससे तो यदि आप मार दें तो अनायास ही काशीवासका मुख्य फल प्राप्त हो जाय और यदि जिलाना चाहें तो कृपा करके मेरा शरीर नीरोग कर दीजिये।* जीवेकी न लालसा, दयाल महादेव ! मोहि, मालुम है तोहि, मरिबेईको रहतु हौं। कामरिपु ! रामके गुलामनिको कामतरु ! अवलंब जगदंब सहित चहतु हौं ॥ रोग भयो भूत-सो, कुभूत भयो तुलसी को, भूतनाथ, पाहि ! पदपंकज गहतु हौं । ज्याइये तौ जानकीरमन-जन जानि जियँ मारिये तो मागी मीचु सूधियै कहतु हौं ॥१६७॥ हे दयामय महादेवजी ! मुझे जीवित रहनेकी इच्छा नहीं है। यह आप जानते ही हैं कि मैं मरनेके ही लिये [काशीपुरीमें] रहता हूँ। हे कामारि ! आप भगवान् रामके दासोंके लिये कल्प- वृक्षके समान हैं, मैं जगन्माता पार्वतीजीके सहित आपका आश्रय चाहता हूँ। [भैरवजीकी प्रेरणासे] यह रोग भूतकी तरह मेरे
- एक बार भैरवजीने गोसाईंजीकी भुजामें दर्द उत्पन्न कर दिया था। उस समय उन्होंने इन तीन कवित्तोंद्वारा श्रीविश्वनाथकी प्रार्थना की थी।