कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली २१६ निवासियोंको अपने पार्श्वमें बसाया है, किन्तु नीच स्त्री-पुरुष इस आदरंगको सह नहीं सके; इसलिये उन्होंने जो कर्म विचारकर नहीं किये उन्हींका फल वे कायर लोग भोगते हैं। किन्तु यह कलिकाल आपसे भय नहीं मानता, यह बड़े आश्चर्य्यकी बात है। देखिये, सुदर्शन चक्रने भगवान् कृष्णके बिना कहे ही [मिथ्यावासुदेव पौण्ड्रकका वध करनेके अनन्तर] काशीको जला दिया था [उसमें यद्यपि श्रीकृष्णका कोई अपराध नहीं था तो भी] आपके प्रेमकी हानि जानकर उनके चित्तमें बड़ा ही संकोच है [फिर बेचारा कलि तो किस खेतकी मूली है] दैवका कोप होनेपर तो एकमात्र आप आशुतोषका ही भरोसा कहा जाता है, क्योंकि लोकोंको व्याकुल देखकर आपने तो कालकूट विष पिया था। रचत विरंचि, हरि पालत, हरत हर, तेरे हीं प्रसाद जग, अग-जग-पालिके। तोहिमें विकास विस्व, तोहिमें विलास सब, तोहिमें समात, मातु भूमिधरबालिके ॥ दीजै अवलंब, जगदंब ! न विलंब कीजै, करुनातरंगिनी कृपा-तरंग-मालिके। रोप महामारी, परितोष महतारी दुनी देखिये दुखारी, मुनि-मानस-मरालिके ॥१७२॥ हे चराचरका पालन करनेवाली माता पार्वती ! तेरी ही कृपासे ब्रह्माजी सृष्टिकी रचना करते हैं, विष्णु पालन