कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२३ उत्तरकाण्ड विरची विरंचिकी, वसति विस्वनाथकी जो, प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी। जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी मोच्छ वितरनि, बिदरनि जगजालकी ॥ देवी-देव-देवसरि-सिद्ध-मुनिवर-बास लोपति बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी। हा हा करै तुलसी, दयानिधान राम ! ऐसी कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी ॥१८४॥ जो ब्रह्माजीकी रची हुई है और स्वयं विश्वनाथकी राजधानी है, और जो कृपामय विष्णु भगवान्को प्राणोंसे भी प्यारी है, वह ज्योतिर्लिङ्गमयी और अगणित लिङ्गमयी पुरी मोक्षदान करनेवाली और जगजालको नष्ट करनेवाली है। वह देवी, देवता, सुरसरि, सिद्धजन और मुनिवरोंकी निवासभूमि है और दर्शनमात्रसे ही अभागोंके ललाटपर लिखी हुई दुर्भाग्यकी रेखाको मिटा देती है, ऐसी काशीकी भी इस कलिकालने दुर्दशा कर रखी है जिसे देखकर, हे दयानिधान श्रीराम ! यह तुलसीदास हाहा खाता है [ आप कृपाकर इसकी रक्षा कीजिये ] । आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी। संकर सरोष महामारीहीतें जानियत, साहिब-सरोष दुनी दिन-दिन दारदी ॥ नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ, काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।