कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाम बिधि मेरो सुखु सिरिस-सुमन-सम, ताको छल-छुरी कोह-कुलिस लै टेई है ॥ ३॥ कौसल्याजी प्रेमसे विह्वल होकर सुमित्राजीसे कहती हैं- "हे सखि ! मैंने कैकेयीको कभी सौत नहीं समझा, सदा अपनी बहिनके समान उसका पालन किया । जब रामचन्द्र मुझको मैया कहते थे तो मैं यही कहती थी, 'मैं तेरी नहीं, भरतकी माता हूँ ! मैया ! मैं तेरी बलैया लेती हूँ-तेरी माता तो कैकेयी है ।' [ गोसाईंजी कहते हैं ] रामचन्द्रने भी सरल भावसे मन-वचन-कर्मसे कैकेयीको माता ही माना, कभी विमाता नहीं समझा । परन्तु वाम विधाताने हमारे सिरस-सुमनसदृश सुकुमार सुख (को काटने) के लिये छलरूपी छुरीको वज्रपर पैनाया है।" कीजै कहा, जीजी ! जू सुमित्रा परि पायँ कहै, तुलसी सहावै बिधि, सोई सहियतु है। रावरो सुभाउ राम-जन्म ही तें जानियत, भरतकी मातु को की ऐसो चहियतु है ॥ जाई राजघर, ब्याहि आई राजघर माहँ, राज-पूतं पाएहूँ न सुखु लहियतु है। देह सुधागेह, ताहि मृगहूँ मलीन कियो, ताहू पर बाहु बिनु राहु गहियतु है ॥ ४ ॥ सुमित्राजी कौसल्याजीके पैरोंपर पड़कर कहती हैं- 'बहिनजी ! क्या किया जाय ? विधाता जो कुछ सहाता है वह सहना ही पड़ता है। आपका स्वभाव तो रामजीके जन्महीसे