काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ काव्यादर्श [३।६३ किं केका-काकु-कः काको मा-माऽऽगा मा समामम¹ ॥६२॥ (३.२) देवानान्नन्दनो देवो नोदनो वेदनिन्दिनः । (पालित) किलकारियां भरते हुए मृगकी छातीको आहत करनेके अपराधको प्राप्त (तू) मेरे पास मत आ, मत आ । क्या कौआ (कभी) केका (मयूर- ध्वनि) की स्वरभङ्गियों (आनन्दकारी पञ्चम) को बोलने वाला हो सकता है ? ॥ ६२ ॥ (३.२) देवताओंको प्रसन्न करने वाले, वेदनिन्दक (असुर) वर्गको दुःखी यह उदाहरण चित्रबन्धकी दृष्टिसे बहुत कलापूर्ण है। इसमें तीनों प्रकार के नियम एक साथ अपनाए गये हैं : (१) पञ्च-स्वर-नियम—अ, इ, उ, ए तथा ओ; (२) पञ्च-स्थान-नियम—(क) स्वर : (i) कण्ठ्य अ, आ. (ii) तालव्य इ, (iii) ओष्ठ्य उ, (iv) कण्ठ-तालव्य ए, (v) कण्ठोष्ठ्य ओ; (ख) व्यञ्जनः (i) कण्ठ्य क, ग, विसर्ग, (ii) कण्ठ-नासिक्य (अनुनासिक) ङ, (iii) मूर्धन्य र, (iv) जिह्वामूलीय ≍क तथा (v) ओष्ठ्य म; (३) पञ्च-व्यञ्जन-नियम—क, ग, ङ, म और र। विसर्ग उपध्मानीय एवं जिह्वा- मूलीय घोष हका ही अघोष रूप (allophone) होनेसे² स्वतन्त्र व्यञ्जनके रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं । नियमतः स्वरके पश्चात् तदङ्गत्वेन प्रयुक्त होनेके कारण अनुस्वार एवं विसर्ग स्वरधर्म अधिक हैं, स्वतन्त्र वर्ण कम । पर स्थान- नियममें सुस्पष्टतया पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यताके कारण उनकी पृथग् गणना उचित है । 'चतुःप्रभृति' अल्पत्वका उपलक्षक ही है। इयत्ताका निर्धारक नहीं। सभी टीकाकारोंने इस श्लोकको चतुर्वर्णनियमका उदाहरण माना है। 'ह'के अघोष रूप और उनके रूपभेद जिह्वामूलीयको छोड़नेपर भी दो बार प्रयुक्त नासिक्य स्पर्श 'ङ' की पञ्चम वर्णताका अपलाप कैसे किया जा सकता है ? इसके अतिरिक्त, जब अन्य दो प्रकारके वर्णनियम भी यहाँ व्यवस्थित रूपसे उपस्थित हैं, तो उन्हें शोभाकारक (चित्रबन्धत्वका प्रयोजक) क्यों न माना जाये ? अतः वस्तुतः आचार्यने यहाँ तीनों प्रकारके चित्रबन्धोंकी संसृष्टि (समकक्षतया उपस्थिति) प्रस्तुत की है ॥ ६२ ॥ (३.२) त्रिवर्ण-नियमवान् चित्र-बन्ध—हिरण्यकशिपु द्वारा मुष्टिसे ताडित स्तम्भसे अतिभीषण निनाद करते हुए भगवान् विष्णु प्रकट हुए । इसी १. अन्वयः—रे रे अमम, अगाङ्ग-गः, अगगुः, मम रोरु-रूरुरो-रुगागो-गः (त्वम्) मा मा-मा आ-गाः । किं काकः केका-काकु-कः ? २. ऋक्प्रा०१।१०: उत्तरेऽष्टा ऊष्माणः । ११: अन्त्याः सप्त तेषामघोषाः ।