काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ काव्यादर्श [३।१०५-१०६ (१५) सा भवेदुभयच्छन्ना, यस्यामुभय-गोपनम् । (१६) सङ्कीर्णा नाम सा, यस्यां नाना-लक्षण सङ्करः ॥ १०५ ॥ एताः षोडश निर्दिष्टाः पूर्वाचार्यैः प्रहेलिकाः । दुष्ट-प्रहेलिकाश्चान्यास्तैरेधोताश्चतुर्दश ॥ १०६ ॥ (१५) वह (पहेली) उभयच्छन्ना है, जिसमें दोनों (आश्रित और आश्रय) को छुपाया जाता है । (१६) सङ्कीर्णा नामक वह होती है, जिसमें एकाधिक पहेलियोंके लक्षणों का सङ्कर (उपकार्योपकारक भावसे तथा तुल्यबलतासे) होता है ॥ १०५ ॥ पिछले आचार्योंने ये सोलह पहेलियां बताई हैं । उन्होंने चौदह दोषयुक्त पहेलियाँ भी पढ़ी (दी) हैं ॥ १०६ ॥ (१५) उभयच्छन्ना—जिस उक्तिमें आश्रित धर्म द्रव्य, गुण और क्रियाका भी गोपन किया जाये, और आश्रयका भी, वहाँ दोनोंके गोपनके कारण 'उभयच्छन्ना' प्रहेलिका होती है । यह भी अर्थगूढा है । १२२वें श्लोकमें उदाहरण है । (१६) सङ्कीर्णा—जिस उक्तिमें नाना (अलग-अलग) लक्षणों (प्रहेलिका- घटक) तत्त्वोंका सङ्कर (सम्मिश्रण) होता है, वह पहेली 'सङ्कीर्णा' होती है । आचार्यने 'सङ्कर' के अर्थमें 'संसृष्टि' शब्दका प्रयोग (२।३५७-३५८) में किया है । उनके मतमें ये दोनों पर्याय हैं । अतः यहाँ (i) अङ्गाङ्गि- भाव संसृष्टि और (ii) समकक्षभाव संसृष्टि दोनों अभीष्ट है । अङ्गाङ्गि- भावसंसृष्टि समकक्ष संसृष्टिकी अपेक्षा दुष्कर होती है । आचार्यने १२३वें श्लोकमें सङ्कीर्णाका जो उदाहरण दिया है, वहाँ दोनों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ अङ्गाङ्गिभावसम्बन्धसे परस्पर सङ्कीर्ण हैं । पूर्वार्धोक्त नामान्तरिता अङ्ग है और उत्तरार्धोक्त वञ्चिता वाक्यपर्यवसायी होनेसे मुख्य है । इसकी शब्द- गूढता या अर्थ-गूढता सङ्करकी विषय प्रहेलिकाओंके स्वरूपपर निर्भर करती है ॥ १०५ ॥ ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार : प्रहेलिकाओंके सोलह भेदोंके लक्षण बतानेके बाद आचार्यने इनका उपसंहार अगले १०६वें श्लोकमें किया है । दण्डीका कहना है कि ये १६ प्रकारकी प्रहेलिकायें पिछले आचार्यों ने बताई हैं । भामहने पूर्वाचार्य रामशर्मा तथा उनके ग्रन्थ 'अच्युतोत्तर' का नाम दिया है । पर भामहने प्रहेलिकाको व्याख्यागम्य बनाने वाला यमक-