काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ काव्यादर्श [३।१६७-१६६ (इ १) मधुरोत्फुल्लनिचुलो, (२) निदाघो मेघदुर्दिनः ॥ १६७ ॥ (३) श्रव्यहंसगिरो वर्षाः, (४) शरदामत्तबर्हिणी । (५) हेमन्तो निर्मलादित्यः, (६) शिशिरः श्लाघ्यचन्दनः' ॥ १६८ ॥ इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीदृशी । (इ १) वसन्त फूल आए हुए निचुल (स्थलवेतस) वाला है । (२) ग्रीष्म मेघोंसे ढंके आकाश वाला है (३) सुनने योग्य हंसोंकी वाणियों वाला बारिस का मौसम है । (४) मदमस्त मयूरों वाली शरद् है । (५) हेमन्तमें निर्मल है सूरज । (६) शिशिरमें लगता है चन्दन अच्छा ॥ १६८ ॥ इस प्रकार कालविरोधकी ऐसी स्थिति दिखाई । छह उदाहरण छह पादोंमें प्रस्तुत करके १६६वें श्लोकके पूर्वार्धमें कालविरोध का उपसंहार किया है । (अ) रात्रिविरोध : पद्मिनी (कमलिनी) रातमें नहीं खिलती, अपितु दिनमें खिलती है । कुमुदिनी रातको खिलती है । यहाँ कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर पद्मिनीको बताया है । इसलिये रात्रिकालका विरोध किया है । अतः प्रत्यक्षविरुद्ध यह सहृदयके लिये उद्वेजक होनेसे दोष है । (आ) दिनविरोध-कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर दिनमें खिलती बतानेसे यहाँ दिनकालविरोध प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे दोष है । (इ) ऋतुविरुद्ध : (१) वसन्तमें निचुल (स्थलवेतस)¹ नहीं खिलता; (२) ग्रीष्म ऋतुमें आकाश मेघच्छन्न नहीं होता; (३) वर्षाकालमें हंसोंका कलरव नहीं सुनाई देता; वे तो शरदारम्भमें जलाशयोंमें आते हैं; (४) बर्हिगण (मयूर) शरद् ऋतुमें मदमस्त नहीं होते, अपितु वर्षाकालमें मेघमालाको देखकर पांखें फैलाकर नाचकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं; (५) हेमन्त ऋतुमें आदित्य शीतजन्य कोहरेसे धुँधला और दक्षिणायनके कारण मन्दद्युति हो जाता है; (६) शिशिर (टाढे पाले वाली सर्दी) में चन्दन शीतल होनेके कारण मनको नहीं भाता; वह तो गर्मीमें अच्छा लगता है । इस प्रकार इन छहों उक्तियोंमें तत्तद् ऋतुओंके विपरीत अनुभव (प्रत्यक्ष) का निरूपण होनेसे यहाँ ऋतुविरोध स्पष्ट है ॥ १६७-१६८ ॥ कालके उक्त तीनों अङ्गोंके विरोधका स्वरूप इस प्रकार दिखलाया है । कालके अन्य अवयवों युगादिका विरोध भी इसी प्रकार समझें । जैसे सत्ययुग १. वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थलवेतसे । शब्दार्णवकोष