भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३२७ ] १.२ व्यपेत ग. त्रिपादादि यमक ३७ २३. परागतरूराजीव वातैर्ध्वस्ता भटैश्चमूः । परागतमिव क्वापि परागततमम्बरम् ॥ २७ ॥ २३. तूफानोंके द्वारा पर्वतके वृक्षोंके समूहके समान सैनिकोंके द्वारा शत्रु- सेना ध्वस्त कर दी गई। धूलसे व्याप्त आकाश मानों कहीं दूर चला गया था ॥ २७ ॥ धानमें होनेसे यहाँ व्यपेत त्रिपादादियमक है। सुखपूर्वक अर्थावबोध तथा सुश्रव्यताके कारण यह सुकर है। आचार्यने प्रथम-द्वितीय-चतुर्थपादादि भेदका उदाहरण नहीं दिया है। इसे अन्य भेदोंसे उपलक्षित समझें ॥ २६ ॥ २३. (२. ग. २) प्रथम-तृतीय-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि- यमक—सत्ताईसवें श्लोकमें आचार्य दण्डीने सम्भवतः पिछले श्लोकमें प्रकृत राजाके शौर्यका वर्णन उसकी सेनाके द्वारा घमासान लड़ाई करके शत्रुसेनाको ध्वस्त करनेका प्रतिपादन करके किया है। पूर्वार्धमें राजाकी सेनाके द्वारा परा चमू (शत्रुसेना) के ध्वंसकी उपमा प्रथम पादमें अन्धड़के द्वारा अग (पर्वत) पर स्थित, अथवा अग = अडिग मजबूत, तरुओंके ध्वंससे दी है। भट एवं वातमें, परा चमू, और अग-तरु-राजीमें उपमेयोपमान सम्बन्ध है। ‘इव’ वाचक है। ‘ध्वस्ता’ साधारण धर्म है। उत्तरार्धमें धूल द्वारा अम्बरको ढँक लिये जानेकी सम्भावना अम्बरके कहीं भाग जानेमें की है। इससे ‘शत्रुसेनाका अधिष्ठान, परमाश्रय विजिगीषितव्य राजा कहीं जा छुपा है’, यह आशय भी व्यक्त होता है। इस प्रकार उत्तरार्धमें वस्तुकी व्यञ्जना करने वाली उत्प्रेक्षा है। दोनों समकक्ष हैं, इस लिये इनकी द्वितीय संसृष्टि है। इस अर्थच्छायासे संवलित उत्साह भावकी शोभा शब्दगत सुकर यमकसे भी हो रही है। प्रथम पादके आरम्भमें प्रयुक्त ‘पर्गत’ वर्णसमुदायकी आवृत्ति बहुत-से वर्णोंके बाद तृतीय पादके आरम्भमें और फिर चार वर्णोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आरम्भमें की गई है। चतुर्थपादगत ‘पराग’ शब्द यद्यपि प्रसिद्ध तो ‘पुष्परजस्’में है, तथापि १. अन्वय :—वातैः अग-तरु-राजी इव परा चमूः भटैः ध्वस्ता । पराग- ततम् अम्बरम् क्वापि परा-गतम् इव ॥