भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।२६] १.२ व्यपेत ग. त्रिपाद आदियमक ३६ २५. कमलेस्समकेशं ते, कमलेर्ष्याकरं मुखम् । कमलेख्यं करोषि त्वं कमलेवोन्मदिष्णुषु¹ ।। २६ ।। २५. तुम्हारा सिर² भौरोंके समान (काले) केशों वाला है; मुख कमल से ईर्ष्या करने वाला है। तू कमला (लक्ष्मी) के समान है। किसे तुम उन्मादशील लोगोंमें नहीं लिखे जाने योग्य करती हो ? अर्थात् तुम्हें देखकर कौन न बौरा जाये ? ।। २६ ।। २५. (२. घ १) एक-जातीय सर्वपादादि व्यपेत सुकर यमक—प्रकृत श्लोकमें आचार्यने किसीके द्वारा उसके सामने स्थित किसी सुन्दरीके सौन्दर्य की प्रशंसा कराई है। प्रथम पादमें अलि उपमान है, केश उपमेय एवं सम वाचक है। साधारण धर्म कृष्णता गम्य है। इस प्रकार उपमा है। द्वितीय पादमें मुखको कमलोंमें भी ईर्ष्या उत्पन्न करने वाला कहकर मुखकी कमलसे समता (उपमा) कही है। √ ईर्ष्य् को २।६२में उपमावाचकोंमें दिया है। अतः दण्डीके अनुसार मुखको कमलोंसे भी सुन्दर बतानेसे व्यतिरेक नहीं है। 'कमलेव' में भी धर्मलुप्ता उपमा है। ये उपमायें समकक्ष हैं। अतः द्वितीय संसृष्टि है। प्रथम पादके आदिमें प्रयुक्त 'कमले' वर्णसमुदाय पाँच- पाँच अक्षरोंके व्यवधानसे अगले तीन पादोंके आदिमें आवृत्त है। एक ही वर्णसमुदायकी व्यवधानसे आवृत्तिके कारण यह एकजातीय चतुष्पादादि व्यपेत सुकर यमक है । उत्तरार्धका यह अर्थ टीकाओंके अनुकरणमें किया है। पाणिनिका अनु- शासन यदि तनिक ढीला किया जा सके,³ तो यह व्याख्या प्रस्तुत है : कमला (समुद्रसे उत्पन्न लक्ष्मी) ने जैसे उसके रूपको देखकर मस्त होने वाले सुरा- सुरोंमें लेखों (देवों⁴) के हितकारी (विष्णु) से इतर कर दिया था, वैसे १. अन्वय :—ते कम् अलेः समकेशम्; मुखं कमलेर्ष्याकरम् । त्वं कमला इव । उन्मदिष्णुषु कम् अलेख्यं करोषि ? २. अमरकोष ३।३।५ : मारुते, वेधसि, ब्रध्ने कः; कं शिरोऽम्बुनोः । ३. लेखेभ्यो हितो लेख्यः 'तस्मै हितम्' (अष्टा० ५।१।५) अर्थमें गवादि- गणान्तर्गत न होते हुए भी 'उ-गवादिभ्यो यत्' (अष्टा० ५।१।२) से 'यत्' यदि किया जा सके । अन्यथा 'प्राक् क्रीताच्छः' (५।१।१) से 'लेखीय' रूप पाणिनिके अनुसार शुद्ध है । ४. अमरकोष १।१।८ : आदितेया, दिविषदो, लेखा, अदितिनन्दनाः ।