काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।४६] दुष्कर यमक ५६ ११. मतान्धुनानाऽरमतामकामतामताप-लब्धाग्रिमतानुलोमता । मतावयत्युत्तमता-विलोमतामताम्यतस्ते समता, न वामता१ ॥ ४६ ॥ ११. पूर्णतः आनन्दमग्न, अथवा रमते राम विरक्त पुरुषोंको प्रिय, निष्का- मताको पीछे छोड़ती हुई, उत्तमता (श्रेष्ठता) की विपरीतता अर्थात् श्रेष्ठत्व- विघातक वामताको नहीं प्राप्त करने वाली, अथवा नष्ट करने वाली, बिना क्लेशके प्राप्त श्रेष्ठताके अनुकूल स्वभाव वाली समता (सर्वत्र समभाव वाली दृष्टि) श्रेष्ठताके प्रतिकूल भावकी कामना नहीं करते हुए, अथवा ग्लानि-हर्ष आदि भावोंसे रहित, अथवा सांसारिक दुःखोंसे दुःखी न होते हुए तुम्हारी बुद्धिमें गतिशील है, वर्तमान है । वामता नहीं ।। ४६ ।। रजन्यां प्रियाविरहज्वालावलीढस्य मे प्राणा अवश्यं संशयमापन्ना इत्यर्थः । यातव्ये = प्रियां प्रति मच्छासन्देशार्थं गन्तव्ये कर्मणि विरामोऽवसानं 'न' इति निषेधो यस्य न, सोऽयातव्यविरामः तस्य सम्बुद्धौ अयातव्यविराम अवश्य- ङ्गामिन् हे मयि करुणामय मे सखे, 'अम रोगे' (चुरादिः), अमनम् आमो रुजा, तं यातीति आम-याः, तेन आम-या; मया तव सख्याऽनेन जनेन; मयः क्षयः, अमयो वृद्धिः, ताभ्याम् आलम्ब्यः आश्रयितव्यश्चासौ कलामयश्चन्द्रः आमयो रुजाकरो यस्याः सा मयामयालम्व्य-कलामयामया ताम् अमूम् मम प्रेयसीम् मद्विरहे समुद्दीपितकन्दर्पकष्टाम्, आमय गमय, सम्भजय । अम गत्या- दिषु (भ्वादिः), हेतुमण्णिच्, कर्तरि लोट्, मध्यम, ए० व० । यहाँ कविने सजातीय 'मया' वर्णसमुदायकी आवृत्ति समूचे श्लोकमें नियत स्थानपर कुल मिलाकर १६ बार की है । पादके आदि और अन्तमें अव्यवहित और व्यवहित रूपसे होनेके कारण यहाँ अव्यपेत-व्यपेतात्मक आद्यन्त चतुष्पाद यमक है । 'मयामया' सजातीय वर्णसमुदायकी आवृत्ति पादान्त और पादादिमें निरन्तर होनेसे चतुष्पाद अव्यपेत अन्तादि यमक भी है । तृतीय पादके अन्तमें 'याम'की अनुलोम और प्रतिलोम आवृत्ति भी है । इस प्रकार यह श्लोक विविध दृष्टियोंसे दुष्कर यमकोंसे सङ्कीर्ण है ।। ४८ ।। ११. (३. घ.) व्यपेत चतुष्पादादि-मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक—इस श्लोकमें कविने किसी पुरुषमें योगियोंसे भी १. अन्वयः— आ-रमतां मताम् अकामतां धुनाना, उत्तमता-विलोमतां धुनाना, अताप-लब्धाग्रिमताऽनुलोमता समता अताम्यतः—(क) अग्ला- यतः, (ख उत्तमताविलोमताम्) अकाङ्क्षतो वा—ते मतौ अयति । (आ- रमतां मताम् अकामतां धुनाना) वामता न (अयति) ।