केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ वाक्य-भाष्य
चाकशीति" (श्वे० उ० ४।६) | केवल उसे देखता है" "इस अक्षर- "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" | ब्रह्मको आज्ञामें [ सूर्य और चन्द्रमा (बृ० उ० ३।८।९) इत्याद्या | स्थित हैं ]" इत्यादि श्रुतियाँ संसार- असंसारिण एकस्यात्मनो नित्य- | धर्मोंसे रहित एक नित्यमुक्त आत्माकी मुक्तस्य सिद्धौ श्रुतयः। स्मृतयश्च | सिद्धिमें ही प्रमाणभूत हैं। इसी प्रकार- सहस्रशो विद्यन्ते। न चार्थवादाः | सहस्रों स्मृतियाँ भी मौजूद हैं। ये सब शक्यन्ते कल्पयितुम्। अनन्य- | अर्थवाद हैं—ऐसी कल्पना भी नहीं योगित्वे सति विज्ञानोत्पादक- | की जा सकती, क्योंकि वे किसी अन्य त्वात्। न चोत्पन्नं विज्ञानं | विधिके शेषभूत न होनेके कारण बाध्यते। | स्वतन्त्र ज्ञान उत्पन्न करनेवाले हैं और | उनसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [किसी | प्रमाणान्तरसे] बाधित भी नहीं होता। अप्रतिषेधाच्च। न चेश्वरो | [ईश्वरका] निषेध न होनेके कारण | भी [पूर्वोक्त श्रुतियाँ अर्थवाद नहीं हैं]। नास्तीति निषेधोऽस्ति। प्राप्त्य- | ईश्वर नहीं है—ऐसा निषेध कहीं | भी नहीं मिलता। यदि कहो कि भावादिति चेन्नोक्तत्वात्। न | ईश्वरकी प्राप्ति (सिद्धि) न होनेके | कारण निषेध नहीं है, तो ऐसा कहना हिंस्यादितिवत्प्राप्त्यभावात्प्रति- | उचित नहीं; क्योंकि उसके विषयमें कहा | जा चुका है। अर्थात् यदि ऐसा कहो | कि [शास्त्रमें] ईश्वरका कोई प्रसङ्ग षेधो नारभ्यत इति चेन्न। | ही नहीं आता, इसीलिये 'न हिंस्यात्सर्वा | भूतानि' इस वाक्यके समान ईश्वरके ईश्वरसद्भावे न्यायस्योक्तत्वात्। | निषेधका भी आरम्भ नहीं किया गया, | तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि अथवाप्रतिषेधादिति कर्मणः फल- | ईश्वरकी सत्तामें उपर्युक्त न्याय कहा | गया है। अथवा 'अप्रतिषेधात्' इस हेतु दान ईश्वरकालादीनां न प्रति- | का यह तात्पर्य समझना चाहिये कि कर्म | का फल देनेमें ईश्वर और काल आदिका षेधोऽस्ति। न च निमित्तान्तर- | प्रतिषेध नहीं किया गया है। कर्मको,