केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण | वह ब्रह्म ही सब प्रकारसे शासन प्रशास्तृ देवानामति परोदेवः, | करनेवाला, देवताओंका भी परम देव, ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयः, | ईश्वरोंका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय देवानां जयहेतुः, असुराणां | तथा देवताओंकी जयका कारण और असुरोंकी पराजयका हेतु है। वाक्य-भाष्य सर्वविषया चेश्वरशक्तिर्विपरीते- | और सर्वतोमुखी है तथा जीवकी तरस्य। कर्म च चित्स्वरूपात्म- | इसके विपरीत है। ईश्वरका कर्म भी सत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य। औ- | उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही होनेवाला है जैसे कि उष्णतारूप ष्ण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्त- | [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योंकी सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता दहनकर्मवत् । राजाद्यस्कान्त- | है, अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी प्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रिया- | सन्निधिमात्रसे] होते हैं उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमें विकार रूपम्। विपरीतमितरस्य। उपासी- | उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, किन्तु जीवके कर्म इससे विपरीत हैं। तेतिवचनादुपास्य ईश्वरो गुरु- | "उपासीत" इस श्रुतिके अनुसार राजवत् । उपासकश्चेतरः | ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय शिष्यभृत्यवत्। अपहतपाप्मादि- | है तथा जीव शिष्य और सेवकके समान उपासक है। "अपहतपाप्मा" आदि श्रवणान्नित्यशुद्ध ईश्वरः। | श्रुतियोंके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है पुण्यो वै पुण्येनेतिवचनाद्विपरीत | तथा "पुण्यो वै पुण्येन" आदि इतरः। | श्रुतिवाक्योंसे जीव इसके विपरीत-स्वभाववाला है। अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरो | अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । | किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण संसारी है। तथा जहाँ ज्ञानादि अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदः | लक्षणोंमें भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद