भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 152 में से

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पृष्ठ 109

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१ ══════════════════════════════════════════════════════════════ पद-भाष्य

मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत्अथवा इससे यह दिखलाया
प्रदर्श्यते—येनाग्न्यादयोऽति-गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योंकि
तेजसोऽपि क्लेशेनैव ब्रह्म विदित-अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर
वन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपिभी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान
सके थे तथा देवताओंका स्वामी
सन्निति ।होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी
कठिनतासे पहचाना था ।

वाक्य-भाष्य

मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
बुद्ध्यादिकल्पितात्मव्यतिरे-यदि कहो कि बुद्धि आदि कल्पित
आत्मासे [ निरुपाधिक चेतनस्वरूप ]
काभिप्रायेण तु लक्षणभेदात्आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने
'लक्षणभेद होनेके कारण' ऐसा हेतु
इत्याश्रयासिद्धो हेतुः ईश्वरात्दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु
आश्रयासिद्ध * है, क्योंकि ईश्वरसे भिन्न
अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् ।और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है ।
ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वम-पूर्व०—[ यदि ईश्वरसे भिन्न और
कोई आत्मा नहीं है तो ] ईश्वरमें ही
विरुद्धलक्षणत्व तथा सुख-दुःख
युक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च ।आदिका योग होना तो ठीक नहीं है ।
न । निमित्तत्वे सति लोक-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है क्योंकि
आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र
विपर्ययाध्यारोपणात्सविट्वत् ।है; लोगोंकी उसमें जो विपरीत बुद्धि है
वह केवल आरोपके कारण है । जिस
यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूप-प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होनेके

पादटिप्पणी: * जहाँ पक्षमें पक्षतावच्छेदकका अभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास माना जाता है; जैसे—'आकाशकुसुम सुगन्धिमान् है, कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत्, इस अनुमानमें 'आकाशकुसुम' जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कभी किसीने नहीं देखा । इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।