भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ पद-भाष्य संग्रामेऽसुराञ्जित्वा जगदराती- | शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भङ्ग नीश्वरसेतुभेत्तॄन् देवेभ्यो जयं | करनेवाले असुरोंको जीतकर जगत्- तत्फलं च प्रायच्छज्जगतः स्थेम्ने । | की स्थितिके लिये वह जय और तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये | उसका फल देवताओंको दे दिया । देवाः अग्न्यादयः अमहीयन्त | कहते हैं, ब्रह्मकी उस विजयमें अग्नि महिमानं प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | आदि देवगण महिमाको प्राप्त हुए ॥१॥ ❦❧❧❧❧❧❧❧❧❦ यक्षका प्रादुर्भाव त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है, और हमारी ही यह महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [ यक्षरूपमें प्रकट हुए ] उस ब्रह्मको 'यह यक्ष कौन है ?' ऐसा न जान सके ॥ २ ॥ वाक्य-भाष्य विजिग्येऽजैषीदसुरान् । ब्रह्मण | जीत लिया । अर्थात् ब्रह्मकी इच्छारूप इच्छानिमित्तो विजयो देवानां | निमित्तसे देवताओंकी विजय हो बभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो | गयी । ब्रह्मकी उस विजयमें देवताओं- विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञा- | को महत्ता प्राप्त हुई । लोककी स्थितिके दिलोकस्थित्यपहारिष्वसुरेषु परा- | हेतुभूत यज्ञादिको नष्ट करनेवाले जितेषु देवा वृद्धिं पूजां वा | असुरोंके पराजित हो जानेपर देवताओं- प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त | किया ॥ १ ॥ ───⊱⊰○⊱⊰─── त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्यय- | 'त ऐक्षन्त' इत्यादि शास्त्रवाक्य, | मिथ्याप्रत्ययरूप होनेके कारण त्वाद्धेयत्वख्यापनार्थमाम्नायः । | [ अभिमानका ] हेयत्व प्रतिपादन | करनेके लिये है ।