केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पद-भाष्य स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भु- | अपनी योगमायाके प्रभावसे सबको तेन विस्मापनीयेन रूपेण देवाना- | विस्मित करनेवाले अति अद्भुतरूपसे मिन्द्रियगोचरे प्रादुर्बभूव प्रादु- | देवताओंकी इन्द्रियोंका विषय होकर र्भूतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म | प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तः | प्रकट हुए ब्रह्मको देवतालोग यह देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं | न जान सके कि यह यक्ष अर्थात् महद्भूतमिति ॥२॥ | पूजनीय महान् प्राणी कौन है ?॥२॥ ❖❖❖ वाक्य-भाष्य ख्यापनार्थस्तद्धैषामित्याद्याख्या- | देवताओंके अभिप्रायको जान गया) यिकाम्नायः। | आदि आख्यायिकारूप आम्नाय | (शास्त्र) है। तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामभि- | कहते हैं, वह ब्रह्म इन देवताओंके प्रायं मिथ्याहङ्काररूपं विज्ञज्ञौ | मिथ्या अहंकाररूप अभिप्रायको समझ विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभि- | गया—उसे इसका ज्ञान हो गया । मानशातनेन तदनुजिघृक्षया | उसे जानकर उस मिथ्याभिमानके देवेभ्योऽर्थाय तेषामेवेन्द्रियगोचरे | छेदनद्वारा देवताओंपर अनुग्रह करने- नातिदूरे प्रादुर्बभूव । महेश्वर- | की इच्छासे वह देवताओंके ही लिये शक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन | उनकी इन्द्रियोंका विषय होकर उनसे प्रादुर्भूतं किलकेनचिद्रूपविशेषेण। | थोड़ी ही दूरपर प्रकट हुआ। यह तत्किलोपलभमाना अपि देवा | महेश्वरकी मायाशक्तिसे ग्रहण किये हुए न व्यजानत न विज्ञातवन्तः | किसी बड़े ही विचित्र रूपविशेषसे किमिदं यदेतद्यक्षं पूज्यमिति ॥ २॥ | प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता | लोग यह न जान सके—न पहचान | सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य | कौन है ? ॥ २ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━ ❖ ━━━━━━━━━━━━━━━