भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

११८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४

पद-भाष्य णार्थम् । मिथ्याभिमानस्तु | है। 'यह हमारी ही विजय है, यह युष्माकम्—अस्माकमेवायं वि- | हमारी ही महिमा है' यह तो जयोऽस्माकमेवायं महिमिति। ततः | तुम्हारा मिथ्या अभिमान ही है। तस्मादुमावाक्याद् ह एव विदां- | तत्र उमादेवीके उस वाक्यसे ही चकार ब्रह्मेति इन्द्रः; अवधार- | इन्द्रने जाना कि 'यह ब्रह्म है'। णात् ततो हैव इति, न | 'ततः' पदके साथ 'ह' और 'एव' स्वातन्त्र्येण ॥ १ ॥ | ये अव्यय निश्चय करानेके लिये ही | प्रयुक्त हुए हैं। [अर्थात् उमा | देवीके वाक्यसे ही इन्द्रने ब्रह्मको | जाना] स्वतन्त्रतासे नहीं ॥ १ ॥

यस्मादग्निर्वायुश्चेन्द्रा एते देवा | क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र— ब्रह्मणः संवाददर्शनादिना सामी- | ये देवता ही ब्रह्मके साथ संवाद प्यमुपगताः— | और दर्शनादि करनेके कारण | उसकी समीपताको प्राप्त हुए थे— तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्द्देवान्यदग्निर्वायु- रिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ क्योंकि अग्नि वायु और इन्द्र—इन देवताओंने ही इस समीपस्थ ब्रह्मको स्पर्श किया था और उन्होंने ही उसे पहले-पहल 'यह ब्रह्म है' ऐसा जाना था, अतः वे अन्य देवताओंसे बढ़कर हुए ॥ २ ॥ वाक्य-भाष्य समीपं ब्रह्मविद्यया ब्रह्म प्राप्ताः | नेदिष्ठ अर्थात् अत्यन्त समीप पहुँचकर सन्तः पस्पृशुः स्पृष्टवन्तः—ते हि | ब्रह्मविद्याद्वारा स्पर्श किया था—उन्होंने प्रथमः प्रथमं विदाञ्चकार विदा- | प्रथम यानी पहले-पहल उसे जाना था ञ्चकुरित्येतत्—तस्मादतितराम् | इसलिये वे अन्य देवताओंसे बढ़े हुए अतीत्यान्यानतिशयेन दीप्यन्ते | हैं—उनसे अधिक देदीप्यमान होते हैं;