केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ
पृष्ठ 132, कुल 152 में से
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१२४ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पद-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यदेतद् गच्छतीव च मनः । | कहा जाता है । यह जो मन जाता |
| एतद्ब्रह्म ढौकत इव विषयीकरो- | हुआ-सा मालूम होता है, सो वह |
| तीव । यच्च अनेन मनसा एतद् | मानो ब्रह्मको ही विषय करता है । |
| ब्रह्म उपस्मरति समीपतः स्मरति | और साधक पुरुष इस मनसे जो |
| साधकः अभीक्ष्णं भृशम् । संक- | ब्रह्मका बारम्बार उपस्मरण— |
| ल्पश्च मनसो ब्रह्मविषयः । मन- | समीपसे स्मरण करता है [ वह |
| उपाधिकत्वाद्धि मनसः संकल्प- | उसका अध्यात्म आदेश है ] । |
| स्मृत्यादिप्रत्ययैरभिव्यज्यते ब्रह्म, | मनका सङ्कल्प भी ब्रह्मको ही |
| विषयीक्रियमाणमिव । अतः | विषय करनेवाला है । ब्रह्म मनरूप |
| स एष ब्रह्मणोऽध्यात्ममादेशः । | उपाधिवाला है; इसलिये मनकी |
| सङ्कल्प एवं स्मृति आदि प्रतीतियोंसे | |
| मानो विषय किया जाता हुआ | |
| ब्रह्म ही अभिव्यक्त होता है । अतः | |
| यह उस ब्रह्मका अध्यात्म आदेश है । |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| गच्छतीव प्राप्नोतीव विषयीकरोती- | प्राप्त होता अर्थात् विषय करता है |
| वेत्यर्थः । न पुनर्विषयीकरोति | [ यह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना |
| मनसोऽविषयत्वाद्ब्रह्मणोऽतो मनो | करनी चाहिये ] । मन वस्तुतः ब्रह्मको |
| न गच्छति । येनाहुर्मनो मतमिति | विषय नहीं करता, क्योंकि ब्रह्म तो |
| हि चोक्तम् । तु गच्छतीवेति | मनका अविषय है; इसलिये वह |
| मनसोऽपि मनस्त्वात् । | उसतक नहीं पहुँच सकता, जैसा कि |
| पहले कह चुके हैं कि 'जिससे मन- | |
| मनन किया कहा जाता है।' अतः | |
| मनका भी मन होनेके कारण | |
| 'गच्छतीव' ( मानो जाता है) ऐसा | |
| कहा गया है । |