केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 उपसंहार उपनिषदं भो ब्रूह्रित्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥ [ शिष्यके यह कहनेपर कि ] हे गुरो ! उपनिषद् कहिये [ गुरुने कहा ] 'हमने तुझसे उपनिषद् कह दी । अब हम तेरे प्रति ब्राह्मण- जातिसम्बन्धिनी उपनिषद् कहेंगे' ॥ ७ ॥ पद-भाष्य उपनिषदं रहस्यं यच्चिन्त्यं हे भगवन् ! जो चिन्तनीय भो भगवन् ब्रूहि इति । उपनिषद् यानी रहस्य है वह मुझसे कहिये । एवमुक्तवति शिष्ये आहा- शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य- चार्यः—उक्ता अभिहिता ते तव ने कहा, 'तुझसे उपनिषद् तो कह दी गयी।' वह उपनिषद् क्या है ? उपनिषत् । का पुनः सेत्याह— सो बतलाते हैं—हमने तेरे प्रति ब्राह्मी-ब्रह्म यानी परमात्मसम्बन्धिनी ब्राह्मीं ब्रह्मणः परमात्मन इयं उपनिषद् ही कही है, क्योंकि पूर्व- ब्राह्मीं ताम्, परमात्मविषयत्वा- कथित विज्ञान परमात्मसम्बन्धी ही था । 'वाव'—निश्चय ही 'ते उपनिषदमब्रूम' दतीतविज्ञानस्य, वाव एव ते इस वाक्यके द्वारा पहले कही हुई उपनिषद्को ही लक्ष्य करके 'मैंने उपनिषदमब्रूमेति उक्तामेव तुमसे परमात्मसम्बन्धिनी उपनिषद् ही कही है' इस प्रकार* अगले परमात्मविषयामुपनिषदमब्रूमेत्य- ग्रन्थका विषय स्पष्ट करनेके लिये निश्चय करते हैं । वधारयत्युत्तरार्थम् । वाक्य-भाष्य उपनिषदं भो ब्रूहि इत्युक्ता- इस प्रकार उपनिषद् कह चुकनेपर यामप्युपनिषदि शिष्येणोक्त भी जब शिष्यने कहा कि 'उपनिषद् कहिये' तब आचार्य बोले—'मैंने आचार्य आह—उक्ता कथिता तुझसे उपनिषद् और आत्माकी
- उपनिषदके जिज्ञासु शिष्यसे आचार्य पूर्वमें ही उपनिषद्का कथन कर यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तर ग्रन्थमें उपनिषद्का वर्णन नहीं है ।