भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

१३० केनोपनिषद् [ खण्ड ४

पद-भाष्य किं पूर्वोक्तोपनिषच्छेषतया | पहले जो उपनिषद् कही गयी तत्सहकारिसाधनान्तरापेक्षा, अथ | है उसके अवशेषरूपसे किन्हीं अन्य निरपेक्षैव ? सापेक्षा चेदपेक्षित- | सहकारी साधनोंकी अपेक्षा है विषयामुपनिषदं ब्रूहि । अथ | अथवा वह सर्वथा निरपेक्षा ही कही निरपेक्षा चेदवधारय पिप्पलाद- | गयी है ? यदि वह सापेक्षा है तो वन्नातः परमस्तीत्येवमभिप्रायः । | अपेक्षित विषयसम्बन्धिनी उपनिषद् एतदुपपन्नमाचार्यस्यावधारण- | कहिये और यदि उसे किसीकी वचनम् ‘उक्ता त उपनिषत्’ | अपेक्षा नहीं है तो पिप्पलादके इति । | समान* इससे पर और कुछ नहीं ननु नावधारणमिदम्, यतो- | है—इस प्रकार निर्धारण कीजिये— ऽन्यद्वक्तव्यमाह ‘तस्यै तपो दमः’ | यह शिष्यके प्रश्नका अभिप्राय है । इत्यादि । | अतः आचार्यका ‘तुझसे उपनिषद् सत्यम्, वक्तव्यमुच्यते आचा- | कह दी गयी’ यह अवधारण वाक्य [हाशिया: तपःप्रभृतीनां] र्येण न तूक्तोपनिष- | ठीक ही है । [हाशिया: ब्रह्मविद्याया] च्छेषतया तत्सहकारि- | शङ्का—यह अवधारण वाक्य [हाशिया: अशेषत्वप्रति-] साधनान्तराभिप्रायेण | नहीं हो सकता, क्योंकि ‘तस्यै तपो [हाशिया: पादनम्] वा; किं तु ब्रह्मविद्या- | दमः’ इत्यादि आगामी वाक्यद्वारा प्राप्त्युपायाभिप्रायेण वेदैस्तदङ्गैश्च | कुछ और कहने योग्य बात कही | गयी है । | समाधान—ठीक है, आचार्यने | एक दूसरे कथनीय विषयको तो | कहा है; तथापि उसे पूर्वोक्त | उपनिषद्के अवशेषरूप अथवा | अन्य सहकारी साधनरूपसे नहीं | कहा । बल्कि ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके | उपाय बतलानेके ही अभिप्रायसे | कहा है, क्योंकि मन्त्रमें वेद और

  • देखिये प्रश्नोपनिषद् ६ । ७