केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
पद-भाष्य
तस्मादवधारणार्थतैव प्रश्नप्रति- | प्रश्नका जो उत्तर है वह [ उपदेश- वचनस्योपपद्यते । एतावत्येवेयम् | की समाप्तिका ] अवधारण करनेके उपनिषदुकान्यनिरपेक्षा अमृत- | लिये है—ऐसा मानना ही ठीक है। त्वाय् ॥ ७॥ | अर्थात् अमरत्व-प्राप्तिके लिये किसी | अन्य साधनकी अपेक्षासे रहित इतनी | ही उपनिषद् कही गयी है ॥ ७ ॥
❖❖❖ विद्याप्राप्तिके साधन
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
उस (ब्राह्मी उपनिषद्) की तप, दम, कर्म तथा वेद और सम्पूर्ण वेदांग—ये प्रतिष्ठा हैं एवं सत्य आयतन है ॥ ८ ॥
पद-भाष्य
यामिमां ब्राह्मीमुपनिषदं तवा- | तुम्हारे सामने जिस ब्राह्मी ग्रेस्रूमेति तस्यै तस्या उक्ताया | उपनिषद्का वर्णन किया है उस उपनिषदः प्राप्त्युपायभूतानि | पूर्वकथित उपनिषद्की प्राप्तिके तपआदीनि । तपः कायेन्द्रिय- | उपायभूत तप आदि हैं। शरीर, मनसां समाधानम् । दमः उप- | इन्द्रिय और मनके समाधानका | नाम तप है । दम उपशम | (विषयोंसे निवृत्त होने) को कहते
वाक्य-भाष्य
तस्या वक्ष्यमाणाया उपनिषदः | उस आगे कही जानेवाली उपनिषद्- तपो ब्रह्मचर्यादि दम उपशमः कर्म | की तप—ब्रह्मचर्यादि, दम—इन्द्रिय- अग्निहोत्रादीत्येतानि प्रतिष्ठाश्रयः। | निग्रह तथा अग्निहोत्रादि कर्म—ये सब एतेषु हि सत्सु ब्राह्मयुपनिषत् | प्रतिष्ठा—आश्रय हैं। इनके होनेपर प्रतिष्ठिता भवति। वेदाश्चत्वारोऽ- | ही ब्राह्मी उपनिषद् प्रतिष्ठित हुआ ङ्गानि च सर्वाणि । प्रतिष्ठेत्यनु- | करती है। चारों वेद तथा सम्पूर्ण | वेदाङ्ग भी प्रतिष्ठा ही हैं। इस प्रकार | [वेदाः सर्वाङ्गानि के आगे ] 'प्रतिष्ठा'