भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

८ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ──────────────────────────────────────────────────── पद-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
ब्रह्मविज्ञानात्संसारबीजमज्ञानंब्रह्मतत्त्वविज्ञानसे ही कामना और
कामकर्मप्रवृत्तिकारणमशेषतोकर्मकी प्रवृत्तिका कारण तथा
निवर्तते, “तत्र को मोहः कःसंसारका बीजभूत अज्ञान पूर्णतया
शोक एकत्वमनुपश्यतः” ( ई०निवृत्त हो सकता है; जैसा कि
उ० ७) इति मन्त्रवर्णात्,“उस अवस्थामें एकत्व देखनेवाले
“तरति शोकमात्मवित्” ( छा०पुरुषको क्या मोह और क्या शोक
उ० ७। १। ३) इति, “भिद्यतेहो सकता है” इत्यादि मन्त्रवर्ण
हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।तथा “आत्मज्ञानी शोकको पार कर
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टेजाता है” “उस परावरको देख
परावरे” (मु० उ० २। २। ८)लेनेपर उसकी हृदय-ग्रन्थि टूट जाती
इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।है, सारे सन्देह नष्ट हो जाते हैं
और समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं”
इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।

वाक्य-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
प्राप्त्यर्थमेव भवति । निष्कामस्यपुरुषके लिये तो प्राणत्व-प्राप्तिका ही
त्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्माष्ट्र्यैकारण होता है, किन्तु निष्काम पुरुष-
भवति; आदर्शनिर्माजर्नवत् ।के लिये वह दर्पणके मार्जनके समान
उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भोआत्मज्ञानके प्रतिबन्धकोंका निवर्तक
निरर्थकत्वात् । “कर्मणा वध्यतेहोता है । हाँ, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त
जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।हो गया है उसके लिये निष्प्रयोजन
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयःहोनेके कारण कर्मके आरम्भकी अपेक्षा
पारदर्शिनः” ( महा० शा०नहीं है । जैसा कि “जीव कर्मसे बँधता
२४२ । ७) इति । “क्रिया-है और आत्मज्ञानसे मुक्त हो जाता है,
पथश्चै व पुरस्तात्संन्यासश्च तयोःइसलिये पारदर्शी यतिजन कर्म नहीं
संन्यास एवात्यरेचयत्” इतिकरते” “पूर्वकालमें कर्ममार्ग और
संन्यास [ दो मार्ग ] थे उनमें संन्यास
ही उत्कृष्ट था” “किन्हींने त्यागसे