केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
पद-भाष्य दुःखे च कार्ये वार्यमाणमपि प्रव- | जानेपर भी अत्यन्त दुःखमय र्तत एव मनः। तस्माद्युक्त एव | कार्यमें भी प्रवृत्त हो ही जाता है। केनेषितमित्यादिप्रश्नः। | अतः 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्न उचित ही है। केन प्राणः युक्तः नियुक्तः | किसके द्वारा नियुक्त यानी प्रेरितः सन् प्रैति गच्छति स्व- | प्रेरित हुआ प्राण अपने व्यापारमें व्यापारं प्रति । प्रथम इति प्राण- | प्रवृत्त होता है? 'प्रथम' यह प्राणका विशेषणं स्यात्, तत्पूर्वकत्वात् | विशेषण हो सकता है, क्योंकि सर्वेन्द्रियप्रवृत्तीनाम् । | समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्तियाँ प्राण- पूर्वक ही होती हैं। केन इषितां वाचम् इमां | लौकिक पुरुष किसके द्वारा शब्दलक्षणां वदन्ति लौकिकाः। | इच्छित यह शब्दरूपा वाणी बोलते तथा चक्षुः श्रोत्रं च स्वे स्वे | हैं? तथा कौन देव—द्योतनवान् विषये क उ देवः द्योतनवान् | (प्रकाशमान) व्यक्ति चक्षु एवं युनक्ति नियुङ्क्ते प्रेरयति ॥१॥ | श्रोत्रेन्द्रियको अपने-अपने व्यापारमें नियुक्त-प्रेरित करता है-॥१॥
पद-भाष्य
एवं पृष्टवते योग्यायाह गुरुः। | इस प्रकार पूछनेवाले योग्य
शिष्यसे गुरुने कहा—तू जो
शृणु यत् त्वं पृच्छसि, मनआदि- | पूछता है कि मन आदि इन्द्रिय-
समूहको अपने विषयोंकी ओर
करणजातस्य को देवः स्वविषयं | प्रेरित करनेवाला कौन देव है और
वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता
प्रति प्रेरयिता कथं वा प्रेरयतीति। | है, सो सुन—