भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ पद-भाष्य

असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि | शङ्का—प्रश्नके उत्तरमें तो यह नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेत- | बतलाना चाहिये था कि इस दननुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य | प्रकारके गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि- श्रोत्रमिति। | को प्रेरित करता है; उसमें यह | कहना कि वह श्रोत्रका श्रोत्र है— | ठीक उत्तर नहीं है। नैष दोषः, तस्यान्यथाविशेषा- | समाधान—यह कोई दोष नहीं नवगमात्। यदि हि श्रोत्रादि- | है, क्योंकि उस प्रेरकका और व्यापारव्यतिरिक्तेन स्वव्यापा- | किसी प्रकार कोई विशेषरूप नहीं रेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता | जाना जा सकता। यदि दराँती अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्, | आदिका प्रयोग करनेवालेके समान तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात्। | श्रोत्रादि व्यापारसे अतिरिक्त किसी न त्विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता | अपने व्यापारसे विशिष्ट कोई स्वव्यापारविशिष्टो लवित्रादि- | श्रोत्रादिका नियोक्ता ज्ञात होता तो वदधिगम्यते। श्रोत्रादीनामेव तु | यह उत्तर अनुचित होता। किन्तु संहतानां व्यापारेणालोचन- | यहाँ खेत काटनेवालेके समान कोई सङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलाव- | श्रोत्रादिका स्वव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता | ज्ञात नहीं है। अवयव-सहयोगसे | उत्पन्न हुए श्रोत्रादिका जो चिदा- | भासकी फलव्याप्तिका लिङ्गरूप | आलोचना, सङ्कल्प एवं निश्चय | आदिरूप व्यापार है उसीसे यह

वाक्य-भाष्य

कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; | कैसे ? [सो इस प्रकार कि] जिससे तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम्। | प्राणी सुनते हैं उसे 'श्रोत्र' कहते हैं। शब्दोपलब्धिरूपतयावभासकत्वं न | उसका जो शब्दको प्रकाशित करना है स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, | वह 'श्रोत्रत्व' है। श्रोत्रका जो शब्द- आत्मनश्च चिद्रूपत्वात्। | के उपलब्धिरूपसे प्रकाशकत्व है वह | स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन | है और आत्मा चेतनरूप है।