भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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२४ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य

“यदादित्यगतं तेजो जगद्भा- | गीतामें भी कहा है—“जो तेज सयतेऽखिलम्” (गीता १५।१२) | सूर्यमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्को “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति | प्रकाशित करता है” “हे भारत ! भारत” (गीता १३।३३) इति | इसी प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्रको क्षेत्री च गीतासु। काठके च “नित्यो | प्रकाशित करता है।” कठोप- नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” | निषत्में भी कहा है—“वह (२।२।१३) इति। श्रोत्राद्येव | नित्योंका नित्य और चेतनोंका सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति | चेतन है” इत्यादि । श्रोत्रादि प्रसिद्धम्; तदिह निवर्त्यते। अस्ति | इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत किमपि विद्वद्बुद्धिगम्यं सर्वान्तर- | चेतन है—यह बात [लोकमें] तमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं | प्रसिद्ध है। उस भ्रान्तिका इस श्रोत्रादेरपि श्रोत्रादि तत्सामर्थ्य- | पदसे निराकरण किया जाता है। निमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थ- | अतः श्रोत्रादिका भी श्रोत्रादि श्चोपपद्यत एव। | अर्थात् उनकी सामर्थ्यका निमित्त- | भूत ऐसा कोई पदार्थ है जो | आत्मवेत्ताओंकी बुद्धिका विषय, | सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा, | अजर, अमर और अभयरूप है— | इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ | ठीक ही है।

वाक्य-भाष्य

श्रोत्रमित्याद्यक्षराणामर्थानुगमाद् | 'श्रोत्रम्' इत्यादि अक्षरोंके अर्थके उपपद्यते निर्विशेषस्योपलब्धि- | अनुगमसे नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष स्वरूपस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्ति- | आत्माका मन आदिकी प्रवृत्तिमें कारण निमित्तत्वमिति । मन आदिष्वेवं | होना ठीक ही है। इसी प्रकार [जैसा यथोक्तम् । | कि 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' के विषयमें कहा | गया है] मन, वाक् और प्राणादिके | सम्बन्धमें भी समझ लेना चाहिये।