केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य अतो न विजानीमो यथा येन | अतः जिस प्रकारसे इस ब्रह्मका प्रकारेण एतद् ब्रह्म अनुशिष्यात् | अनुशासन—शिष्यके प्रति उपदेश उपदिशेच्छिष्यायेत्यभिप्रायः । | किया जाय—यह हम नहीं जानते | ऐसा इसका अभिप्राय है। जो वस्तु यद्धि करणगोचरं तदन्यस्मै | इन्द्रियोंका विषय होती है उसीका उपदेष्टुं शक्यं जातिगुणक्रिया- | जाति, गुण और क्रियारूप विशेषणैः। न तज्जात्यादिविशेषण- | विशेषणोंद्वारा दूसरेको उपदेश वद्ब्रह्म तस्माद्विपमं शिष्यानुपदेशेन | किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्म | उन जाति आदि विशेषणोंवाला प्रत्याययितुमिति उपदेशे तदर्थ- | नहीं है। अतः शिष्योंको उपदेश- | द्वारा उसकी प्रतीति कराना बहुत ग्रहणे च यत्नातिशयकर्त्तव्यतां | कठिन है—इस प्रकार श्रुति दर्शयति । | उपदेश और उसके अर्थका ग्रहण | करनेमें अधिक प्रयत्न करनेकी | आवश्यकता दिखलाती है। वाक्य-भाष्य सुखादिवन्मनसो विषयस्तत् ; | नहीं पहुँचता। वह सुखादिके समान् इन्द्रियाविषयत्वात्। | मनका भी विषय नहीं है, क्योंकि वह | इन्द्रियोंका अविषय है। न विद्मो न विजानीमोऽन्तः- | यह ब्रह्म मन आदि इन्द्रियसूहका करणेन यथैतद्ब्रह्म मन आदिकरण- | जिस प्रकार अनुशासन करता है जातमन्विशष्याद् अनुशासनं | अर्थात् जिस प्रकार उनकी प्रवृत्तिका कुर्यात्प्रवृत्तिनिमित्तं भवेत्तथा- | कारण होता है—इन्द्रियोंका अविषय विषयत्वान्न विद्मो न विजानीमः। | होनेके कारण—इस सम्बन्धमें अपने | अन्तःकरणद्वारा हम कुछ नहीं जानते | अर्थात् कुछ नहीं समझते ।