भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ पद-भाष्य तान्युदस्य आत्मानमेव नि- | उन सब उपाधियोंका बाधकर अपने र्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः। | निर्विशेष आत्माको ही ब्रह्म जान— नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- | यही 'एव' शब्दका अर्थ है । जिस विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते | इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि- ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि | की उपासना—ध्यान करते हैं यह इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है । 'उसीको तू ब्रह्म | जान' इतना कह देनेपर भी | [ अनात्मवस्तुमें ब्रह्मभावनाका | निषेध हो ही जाता ] पुन: 'यह नोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा | जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं | किया है वह आत्मामें ही ब्रह्म- | बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा | अन्य उपास्य देवताओंमें ब्रह्म-बुद्धि- वा ॥४॥ | की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इस [देश-कालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥