भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदंऽ श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७॥ जिसे कोई कानसे नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ पद-भाष्य यत् श्रोत्रेण न शृणोति | लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त दिग्देवताधिष्ठितेन आकाश- | आकाशके कार्यभूत तथा दिशा- कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न | रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् | नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- | श्रोत्रसे विषय नहीं कर सकता, ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव | बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ | यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय | किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि | पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जाता बल्कि जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥ वाक्य-भाष्य येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः । | सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं | विषयोंके सहित अवभासित होती हैं— | यह इन मन्त्रोंका तात्पर्य है । “तथा प्रकाशयति” ( गीता १३ । ३३ ) | क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता