भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

पद-भाष्य नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं । एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे 'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य | विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म- दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते | हुए गर्जने लगा । किस प्रकार वाक्य-भाष्य यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा- प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके | विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं। यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं | जानता-ऐसा भी नहीं मानता मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध | किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी | अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?' | शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च' | शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात् चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-