केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य | अब शिष्य और आचार्यके स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- | संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त निर्वृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- | संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको मतमित्यादिना- | ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही रूपसे बतलाती है— ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालोंका बिना जाना हुआ है और न जाननेवालोंका जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओंके समान दृश्य न होनेसे वह विषयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥ पद-भाष्य यस्य ब्रह्मविदः अमतम् | जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत— अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति | अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य | ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः। | अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं | मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो वाक्य-भाष्य यस्यामतम् इति श्रौतम् | 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् । | इस आख्यायिकाका उपसंहार करनेके शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया | लिये है। शिष्य और आचार्यकी अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- | उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है