भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 152 में से

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पृष्ठ 78

७० केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि, आदिमें आत्मभाव करनेवाले | असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म मनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; | विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।* वाक्य-भाष्य आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः। स | अविषयरूपसे आत्मभावसे जाना है सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है। जिसे विज्ञानकी | प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म- रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् | भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही | सम्यग्दर्शी है। इससे विपरीत समझने- मिथ्याज्ञानो भवति । कथम् ? मतं | वाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे ? | [सो कहते हैं—] जिसका ऐसा विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य | विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत | विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि विज्ञानो विदितान्यत्वाद्वह्मणो | ब्रह्म विदितेसे भिन्न है; इसलिये वह न वेद स न विजानाति । | ब्रह्मको नहीं जानता—नहीं समझता । ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा- | इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका नस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म- तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है । कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नहीं; कपिल और कणाद ब्रह्मविषयत्पादनवस्थिततर्कजन्य- | आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक, त्वाद्द्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्या- | अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी त्वमिति। स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | हैं। “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा

  • इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि 'जिन्हें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं । और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है' ।
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