भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ पद-भाष्य 'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है' सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है । | फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे | जाना जाता है—यही बात | बतलानेके लिये कहते हैं— विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व- की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥ पद-भाष्य प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे | होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का | कथन हुआ है । अतः समस्त वाक्य-भाष्य प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है, वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-