भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 152 में से

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पृष्ठ 97

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९

वाक्य-भाष्य


[संस्कृत-मूल]

श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिभिर्नित्य- सर्वविज्ञान ईश्वरे सर्वात्मनि सर्व- शक्तौ सिद्धेऽपि शास्त्रार्थनिश्च- यार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भाव- सिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते । यदिदं जगद्देवगन्धर्वयक्षरक्षः- (ईश्वरस्य जगन्नियन्तृत्व-निरूपणम्) पितृपिशाचादि- लक्षणं द्युवियत्पृथिव्यादित्यचन्द्रग्रह- नक्षत्रविचित्रं विविध- प्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधन- सम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पि- भिरपि दुर्निर्माणं देशकाल- निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- क्रममेतद्भोक्तृकर्मविभागज्ञप्रयत्न- पूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृह- प्रासादरथशयनासनादिवत् । विपक्ष आत्मादिवत् ।


[हिन्दी-अनुवाद]

यद्यपि नित्यसर्वविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् ईश्वर श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धिसे सिद्ध भी है तो भी शास्त्रके अर्थको निश्चय करनेके लिये यहाँ यह [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वरके सद्भावकी सिद्धि किस प्रकार होती है ? इसपर कहते हैं— स्वर्ग, आकाश, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके कारण विचित्र दीखनेवाला तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके उपभोगयोग्य स्थान और साधनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह जितना देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादिरूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिल्पियोंद्वारा भी बनाया जाना कठिन है । अतः यह देश, काल और निमित्तके अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्तिके क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्मके विभागको जाननेवाले किसी चेतनके प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योंकि कार्यरूप होनेके कारण यह उपर्युक्त लक्षणोंवाला है । जैसे कि गृह, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [सभी कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तरूप] आत्मा आकाश आदि [नित्य पदार्थ हैं] ।

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