भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथोच्यते—मा भूद्विषयोपाधिभेदाद् व्यवस्थानम्, उपाध्यन्तरात्तु भविष्यति । तद्यथा संस्कारजत्वमादाय स्मृतित्वव्यवस्थितिः, इन्द्रियसन्निकर्षजत्वमादाय चानुभवत्वव्यवस्थानमिति विरोधपरिहारोऽस्तु । न ; प्रमात्वसामान्यानङ्गीकारे प्रमाणरूपताया विषयव्यवस्थित्यैवोपगमेन उपाध्यन्तरोपन्यासेऽपि स्मृतित्वानुभूति- त्वयोरेकस्मिन्नेव धर्मिण्यर्धे निवेशात् प्रमात्वाप्रमात्वयोरेकविषयतैव । किञ्च—ज्ञानविकल्पानामध्यात्मं भावाभावसंवेदनात् स्मृतित्वानुभूतित्वयो- र्द्वयोरपि प्रत्यभिज्ञायां स्वतः प्रतिभानेन विषयनिरूपणव्यवस्थित्यनङ्गीकारे स्मृति- त्वादेरिदन्तायामपि स्मृत्यवगमप्रसङ्गात् । यदि च संस्कारजत्वमेव स्मृतित्वम्, तदा तस्यैव विरोधेऽभिधीयमाने स एव विरोधसामञ्जस्याय उपाधिरुपन्यस्यत इति नान्यस्य चेतसि निविशते । निर्वचनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में विषय-भेदरूप हेतु से भले ही स्मृतित्व तथा अनुभवत्व की व्यवस्था न हो, अन्य-उपाधि ( निमित्त ) से तो होगी ही । अर्थात् संस्कारजत्व अवच्छेद से स्मृतित्व की तथा इन्द्रिय-सन्निकर्षजत्व अवच्छेद से अनुभवत्व की व्यवस्था होगी । इस तरह स्मृतित्व तथा अनुभवत्व का सङ्कर नहीं होगा । अर्थात् एक ही अवच्छेद से एक अधिकरण में स्थिति के होने पर सङ्कर होता है। यहाँ यद्यपि दोनों एक ही अधिकरण में हैं, परन्तु अवच्छेदक भिन्न हैं, अतः संकर नहीं होगा । खण्डनकर्ता—आप प्रत्यक्षत्व के साथ सङ्कर होने से प्रमात्व को जातिरूप नहीं मानते, किन्तु तत्त्वानुभूतित्वादि रूप ही मानते हैं । अतः यदि संस्कारजत्व, इन्द्रियजत्व आदि उपाधियों को स्मृतित्व और अनुभवत्व का अवच्छेदक मानें, तो प्रत्यभिज्ञा में एक ही धर्मी-अंश में स्मृतित्व और अनुभूतित्व दोनों का सन्निवेश होने से प्रत्यभिज्ञा के एक ही धर्मी-अंश में प्रमात्व और अप्रमात्व का भी सन्निवेश हो जायगा, क्योंकि अनुभव प्रमा है तथा स्मृति अप्रमा । किञ्च—ज्ञान-भेदों के भाव ( अनुभूतित्व आदि धर्म ) और अभाव, दोनों ही मानस-प्रत्यक्ष के विषय होने से यदि स्मृतित्वादि की व्यवस्था विषय के अधीन न मानें, तो इदन्त्व-अंश में भी स्मृतित्व का और तत्ता-अंश में भी अनुभवत्व का भान हो जायगा । किञ्च—प्रत्यभिज्ञा के संस्कारजत्व-अंश में स्मृतित्व तथा इन्द्रियजत्व-अंश में अनुभवत्व दोनों धर्म रहते हैं, यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि संस्कारजत्व ही