खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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जितेन्द्रिय बने रहे। उनका विश्वास था कि ज्ञान से निर्मल-चित्त पुरुष को विषयैकतानता कभी आसक्त नहीं कर सकती। वे सिद्ध समाधियोगी थे। फिर भी उनका योगशुद्ध हृदय पिशुनता को कभी सहन नहीं कर सकता था। मुनिवृत्ति उन्हें प्रिय थी और अयाचित व्रत को वे सर्वोपरि मानते थे। फिर भी उन्होंने अनेक स्थलों पर दान की महत्ता और आवश्यकता मानी है। कृतज्ञता और उपकारी के प्रति प्रत्युपकार पर उनका विशेष आग्रह रहा। भगवद्भक्ति, धर्मनिष्ठा और आस्तिकता तो उनमें पदे-पदे दीखती है। फिर भी आपद्धर्म के लिए ('निषिद्धमप्याचरणीयमापदि') भी कह के उन्होंने अवसर का निर्वाह भी अच्छी तरह किया है। वे बौद्धमत के खण्डनकर्ता होते हुए भी उस मत के प्रति पूरी उदारता रखते थे। स्वयं ऋजुमार्ग के समर्थक होते हुए भी कुटिल व्यक्ति से सरलता बरतना उन्हें कभी पसन्द न था। चाटुकार तो वे थे ही नहीं। निर्भी- कता उनकी रग-रग में भरी थी। फिर भी जनापवाद से उन्हें भय था (नैषध ३।५१), जब कि वे उसकी विशेष परवाह नहीं करते थे। कुल मिलाकर वे सर्वाङ्गपूर्ण व्याव- हारिक और त्रिगुणातीत पारमार्थिक दोनों कूलों को जोड़नेवाले अद्वितीय सेतु कहे जा सकते हैं। इतने महान् प्रतिभाशाली सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र श्रीहर्ष ने अनेक ग्रन्थ और अनेक काव्य लिखे होंगे। किन्तु नैषध और खण्डन के अनुसार¹ अबतक उनके १० ग्रन्थों का पता चलता है, जिनमें आज केवल दो ही उपलब्ध हो रहे हैं। उनके ग्रन्थ-रचना नाम निम्नलिखित हैं : १. अर्णव-वर्णन : इसमें नामानुसार समुद्र का वर्णन बताया जाता है। २. शिवशक्ति-सिद्धि : इसे कोई शिव नामक राजा की वीरता के वर्णनपरक बताते हैं तो कोई गौरी-गिरीश के माहात्म्य-वर्णनपरक मानते हैं। ३. साहसाङ्कचम्पू : इसमें 'साहसाङ्क' उपाधिधारी राजा का चरित्र वर्णित होगा, यह तो स्पष्ट ही है। किन्तु यह 'साहसाङ्क' कौन है, यही प्रश्न है। विक्रम को यह उपाधि प्राप्त थी, अतः इसे विक्रम-चरित्र-वर्णन भी कहा जा सकता है। किन्तु नैषध में 'नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतः' इस प्रकार ग्रन्थ- कार द्वारा उल्लेख होने से और उसके टीकाकार नारायण के इस विवरण में कि 'नवो यः साहसाङ्कोपनाम राजेत्यादि' नवत्व विशेषण का स्वारस्य देखते हुए इसे 'अभिनवसाहसाङ्क' कान्यकुब्जेश्वर का ही वर्णन मानना ठीक दीखता है। ४. छन्दःप्रशस्ति : नाम से तो मालूम पड़ता है कि यह छन्दोग्रन्थ है, किन्तु कुछ लोग इसे छन्द नामक राजा की प्रशस्ति भी मानते हैं। ५. विजय-प्रशस्ति : यह तो प्रायः निर्विवाद है कि इस ग्रन्थ में कान्यकुब्जाधीश्वर गोविन्दचन्द्र के पुत्र और जयचन्द्र के पिता विजयचन्द्र की प्रशस्ति का वर्णन है। श्रीहर्ष को बंगाली बतानेवाले इस 'विजय' को विजयसेन नामक बंग-
१. खण्डन और नैषध तो उपलब्ध ही हैं। 'ईश्वराभिसन्धि' का उल्लेख खण्डन में है। क्रमशः शेष ग्रन्थों का उल्लेख नैषध के निम्नलिखित स्थलों में है : ६।१६०; १८।१५४; २२।१५१; १७।१२२; ५।१३८; ५।१३८; ७।११० और ४।१२३ ।