खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] · स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२३ तदा स्मृतावपि प्रसङ्गः ; यावत्यस्तद्बुद्धयस्तत्र जायन्ते, तदधिकां तादृशबुद्धि- मत्यन्तासतीं प्रत्यजनकत्वस्य स्मृतावपि सम्भवात् । सर्वामेव तादृशबुद्धिं प्रत्यजनकत्वमनुभूतेः, न तु एवं स्मृतेरिति चेन्न । सर्वतद्व्यक्तिप्रमित्यसम्भवात् । किञ्च सर्वामिति कोऽर्थः—किमसतीं सर्वाम्, उत सतीम्, अथ सतीमसती- ञ्चेत्युभयीमपि प्रत्यजनकत्वम् ? आद्ये द्वितीये च स्मृतावपि तदजनकत्वमस्त्येव । न हि 'स्मृतित्वसंसर्गस्मृती सम्बद्धे' इति यावत्यः स्मृतिव्यक्तिषु बुद्धय उत्पद्यन्ते, ताः प्रति प्रत्येकं स्मृतिव्यक्तिषु जनकत्वमस्ति । काञ्चित् सतीं प्रति च तदजनकत्वं प्रागेव दूषितम् । तृतीये नानुभूतावपि तदजनकत्वम्, सत्यासत्यतादृशबुद्धेर्भवेन अभावेन वा सतीमसतीं प्रत्यजनकत्वस्यासम्भवादिति । संभावनामात्र से अलीककार्यनिरूपित जनकता का भी निषेध हो ही सकता है । खण्डन— तब तो स्मृति में भी अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि स्मृति में जितनी स्मृतित्वसंसर्गबुद्धियाँ होती हैं, उन बुद्धियों से अधिक उक्त असत्-बुद्धि की जनकता का निषेध उसमें भी संभावनामात्र से हो सकता है । समर्थन—संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का अभाव लक्षण में अभिप्रेत है । स्मृति में वह नहीं है और अनुभूति में है, अतः कोई दोष नहीं है । खंडन—सामान्य- लक्षणा के खण्डित होने से संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों का ज्ञान हो ही नहीं सकता । किंच—'सम्पूर्ण' शब्द का क्या अर्थ है ? क्या असती ( अयथार्थ ) संपूर्ण, सती ( यथार्थ ) संपूर्ण या असती और सती उभयरूप संपूर्ण अभिप्रेत है ? तीनों ही पक्षों में स्मृति में उक्त बुद्धि की जनकता का अभाव होने से अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि जितनी स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियाँ हैं, उन सबकी जनकता का अभाव एक-एक स्मृति में विद्यमान ही है । समर्थन—हमें सब स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत नहीं, किन्तु प्रत्येक स्मृतित्वसंसर्गबुद्धि की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत है और वह स्मृति में नहीं है । खण्डन--प्रथम पक्ष में असत् ( अयथार्थ ) उक्त बुद्धि की जनकता का अनुभूति में वारण न होने से अनुभूति में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में सती प्रमा के करणरूप ( प्रमाण ) होने से अनुभूति में स्मृतित्व-प्रसंग हो जायगा । तृतीय पक्ष में प्रत्येक निवेश करने पर भी उक्त दोनों दोष बने ही रहेंगे । कारण उक्त अयथार्थ बुद्धि का जनकता अनुभूति में है; अतः उसका निषेध उसमें हो नहीं सकता । और, यथार्थ उक्त बुद्धि के होने से तज्जनकत्व के होने से, तदभाव अलीक होने के कारण असम्भव हो जायगा ।