खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३७ अभाव एव यत्रेति सावधारणं वक्तव्यमिति चेन्न । एवकारेण किमधिकमभि- धीयते ? भावो निषिध्यत इति चेन्न । तस्याभावपदेनैव लब्धत्वात्, भावनिषेधो- ऽभाव इत्यनर्थान्तरमिदम् । भावसामानाधिकरण्यनिषेध एवकारार्थ इति चेन्न । उक्तेनैव गतार्थत्वात् । अन्योन्याभावस्य च तस्य स्मृतावपि सम्भवात् । न हि भावसामानाधिकरण्यं स्मृतिः । स्मृतौ च भावमभावं चैकत्र मन्यमानेन विषय का वैलक्षण्य अतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । निर्वचन—‘जिस ज्ञान में स्मृतित्व का अभाव ही हो, वह ज्ञान अनुभूति है’ ऐसा लक्षण करने पर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । प्रश्न—‘एव’ शब्द का अर्थ क्या है ? उत्तर—‘एव’ शब्द से भाव का निषेध होता है । अर्थात् जिस ज्ञान में स्मृतित्व का अभाव हो, वह ‘एव’ शब्द का अर्थ है । खण्डन— ‘अभाव’ शब्द का अर्थ भी ‘न भावः अभावः’ इस व्युत्पत्ति से ‘जो भाव न हो, वही’ हुआ । तब तो पुनरुक्तिदोष हो जायगा । समर्थन – ‘एव’ शब्द का ‘भावाधिकरणत्व’ अर्थ है, अतः पुनरुक्ति नहीं है । खंडन—‘जहाँ अभाव हो’ इस कथन से ही भावसामानाधिकरण्य का भी निषेध हो जायगा, क्योंकि भाव का निषेध होने पर भावाधिकरणत्व का निषेध भी अर्थतः सिद्ध होता है । अतः शब्द-पुनरुक्ति न होने पर भी अर्थ-पुनरुक्ति अवश्य है । किञ्च—स्मृतित्व-सामानाधिकरण्य का अन्योन्याभाव स्मृति में भी है, क्योंकि स्मृतित्व- सामानाधिकरण्य स्मृति नहीं है । अतः ‘जहाँ स्मृतित्वाभाव ही हो, स्मृतित्वसामा- नाधिकरण्य न हो’ ऐसा कहने पर भी स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति स्थिर ही है । जब आप एक ही स्मृति में स्मृतित्व और स्मृतित्व का अन्योन्याभाव दोनों मानते हैं, तो स्मृतित्वसामानाधिकरण्य और उसका अन्योन्याभाव भी अवश्य मानेंगे, क्योंकि स्मृतित्वसामानाधिकरण्य का तादात्म्य और उसका अन्योन्याभाव दोनों परस्पर प्रतिक्षेप (निषेध) रूप हैं । अर्थात् जब स्मृति में स्मृतित्वसामानाधिकरण्य का तादात्म्य नहीं है, तो उसका अन्योन्याभाव अवश्य रहेगा । शंका—जब स्मृतित्व का सामानाधिकरण्य है, तो उसके अभाव की स्थिति दुर्घट-सी प्रतीत होती है । खण्डन—जैसे पृथिवी और जल में रूप तथा रस का सामानाधिकरण्य है; किन्तु तेज में रस का अभाव होने से उसके सामानाधिकरण्य का अभाव दुर्घट नहीं १८