खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] स्मृति-लक्षण का खंडन १४३ कार्यैक्यानवधारणे च कारणत्वानवधारणात् । तदैक्ये च तदेव लक्षणं स्यात् । येन ज्ञानेनार्थो ज्ञाततात्मकः क्रियते, तदनुभवः । येन तु ज्ञानमेव तथा, तत् स्मरणमिति चेन्न । ज्ञातो ज्ञास्यते चेत्यनुमानादावव्याप्तेः । ततश्च विषयतः स्मृतिविवेचनमन्ततो वाक्येनाप्यनुभाव्यत्वात् कार्यकारणाभ्यां चानुगतरूपस्य प्रागसिद्धेः, जातितश्च सङ्करप्रसङ्गादशक्यमिति । किञ्च—'स्मृतिं प्रति संस्कारः कारणम्' इस कार्य-कारणभाव की सिद्धि के बिना उक्त लक्षण संभव नहीं और उक्त कार्यकारणभाव कार्यता के अवच्छेदक स्मृतित्वजाति की सिद्धि के बिना हो नहीं सकता, कारण प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व के साथ साङ्कर्य होने से स्मृतित्वजाति अद्यावधि सिद्ध ही नहीं हुई है। कथञ्चित् सिद्ध भी हो जाय, तो लाघव या पूर्व उपस्थित होने से स्मृतित्व ही लक्षण होगा, ‘संस्कारासाधारणकारणकत्व’रूप लक्षण में कोई प्रमाण नहीं है । निर्वचन—'जिस ज्ञान से अर्थ ( विषय ) ज्ञाततारूप धर्म से युक्त किया जाय, वह ज्ञान अनुभूति है' और 'जिसमें ज्ञाततायुक्त ही ज्ञाततायुक्त किया जाय, वह स्मृति है' ऐसे लक्षण करेंगे । खंडन—तब तो ज्ञात ( अतीत ) और ज्ञास्यमान ( अनागत ) विषय की अनुमिति के स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति ही नहीं होगी; क्योंकि वहां विषयरूप अधिकरण उस काल में नहीं है । एवञ्च उक्त लक्षण भूत-भविष्यत् स्थल में न जाने से वहां अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--वर्तमान विषयस्थल में अनुमिति में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति भी हो जायगी, क्योंकि अनुमिति ज्ञात को ही विषय करती है, अतः वह ज्ञातताविशिष्ट ही है । तस्मात् ‘ज्ञातो घटः’ इस अनुव्यवसाय-स्थल में ज्ञानसम्बन्ध भासता है, ज्ञाततारूप अपूर्व धर्म नहीं । अन्यथा यदि ज्ञान-स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति मानें, तो तुल्ययुक्ति से इच्छा और कृति में इष्टता और कृतता भी माननी पड़ेगी; पर वैसा न मानते । यद्यपि 'गृहीतविषयकं ज्ञानं स्मृतिः' यह वाक्य लक्षण को प्रतिपादन करता है, तथापि लक्षणघटकतया गृहीत अर्थ को भी प्रतिपादन करता ही है। अतः उस अंश में गृहीतविषयक होने से लक्षणवाक्यजन्य बोध में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति होगी, विषयकृत तथा अनुगत स्मृतित्वादिरूप के सिद्ध होने से कार्यकारणभावकृत और साङ्कर्य होने से जातिकृत स्मृति का भी निर्वचन सम्भव नहीं ।