भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

परिच्छेद ] प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन १६६ पत्तेः, प्रमात्वनिरूपणवैयर्थ्यापाताच्च । वस्तुतस्तु प्रमयैव घटादितत्त्वव्यवहारोऽपि तर्ह्यस्तु इत्यास्तां विस्तरः । प्रमाणसामान्य-लक्षणखण्डनम् एवं प्रमितेरनिरुक्त्या प्रमाकरणं प्रमाणमित्यप्ययुक्तम्; करणार्थानिरुक्तेश्च । प्रथम-करणत्वलक्षण-खण्डनम् ननु कारकान्तरेऽचरितार्थस्य हेतुत्वं करणत्वम् । कर्तुर्हि करणं निष्पादयतः कारकान्तरे चरितार्थत्वम्, स्वरूपतोऽनिष्पादनेऽपि व्यापारवतया निष्पादनात् । तादृशस्य च तस्य करणत्वात् । की सिद्धि आप नहीं कर सकते । किञ्च—जैसे लक्षण प्रमितत्व से अनवगत-स्वरूप सत् लक्ष्य के व्यवहार का कारण है, वैसे ही प्रमा भी स्वरूपसत् ही घटादि-व्यव- हार की प्रयोजक होगी । फिर प्रमात्व से प्रमा के अवगम के लिए प्रमा के लक्षण का निरूपण व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—लक्षण व्यतिरेकी हेतु है और व्याप्तिपक्ष- धर्मतया प्रमितस्वरूप से अवगत ही हेतु अनुमिति का जनक होता है । अतः 'प्रमितत्व से अनवगत लक्षण व्यवहार का प्रयोजक है,' यह कथन असङ्गत है । ऐसे अनेक दूषण हैं, अतः विस्तार न कर एतावत् खण्डन ही पर्याप्त है । प्रमाण-सामान्य के लक्षण का खण्डन पूर्वोक्त रीति से प्रमा का लक्षण न हो सकने पर 'प्रमितिकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण-लक्षण भी अयुक्त हुआ, कारण विशेषण की निरुक्ति के बिना विशिष्ट की निरुक्ति ही नहीं हो सकती । किञ्च—'करण' शब्द के अर्थ की निरुक्ति भी असम्भव है । प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन समर्थन—जो हेतु कारकान्तर में अचरितार्थ ( अनुपयुक्त ) होकर क्रिया का जनक हो, वह करण है । कर्ता करण का निष्पादन करता है, अतः कारकान्तर में चरितार्थ है । यद्यपि वह करण का स्वरूप से निष्पादन नहीं करता, तथापि व्यापार- वत्त्वरूप से निष्पादन करता ही है । क्योंकि व्यापारयुक्त को ही 'करण' कहते हैं और विशेषण का निष्पादक विशिष्ट का भी निष्पादक होता है । २२