भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम मैवम्; अनीश्वरवादे अङ्कुरादीनामकरणकत्वप्रसङ्गात् । सुषुप्त्यनन्तरभाविन्याः प्रमायाः परिगणितकरणोपाधिभेदपरिसङ्ख्यातेषु प्रमाराशिषु बहिर्भावप्रसङ्गात् । अचेतनस्यापि कर्तृत्वे चातिप्रसङ्गात् । सेश्वरवादे तु ईश्वरव्यापारविषयः सर्वं कारणमिति नाकरणं कारणं स्यात् । ओमित्यभिधाने च अकारणमात्रं व्यवच्छेद्यमिति कारणं करणमित्ये- वोच्यताम्, वृथा विशेषणपूरणप्रयासः । अथ मन्यसे – न धर्म्यन्तरव्यवच्छेदाय विशेषणानि, किन्तु एकस्यापि धर्मिणो रूपभेदेन करणपदाभिधेयतोपदर्शनायेति । एवं तर्हि एतद्रूपालिङ्गितस्य का करण कर्तृव्यापार का विषय नहीं है, अतः अंकुर के करण में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि अङ्कुर करणरहित ही हैं, तो 'कार्यं करणपूर्वकम्' इस व्याप्ति के न होने से रूपादिविषयक ज्ञानरूप कार्य से चक्षुरादि करण की अनुमिति न होगी, जो अनीश्वरवादी के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा । किञ्च सुषुप्ति के अनन्तर-क्षण में उत्पन्न प्रमा का करण भी कर्तृव्यापार का अविषय होने से करण न होगा । यदि कहें कि वह प्रमा अकरणक ही है, तो परिगणित करणरूप निमित्त से उत्पन्न पञ्च या षट्-प्रमाराशि में उसका अन्तर्भाव न होगा और एक सप्तम प्रमा माननी पड़ेगी । यदि ज्ञानरहित जीव या शरीर को ही सुषुप्त्यनन्तर जात प्रमा का कर्ता मानें, तो जीव ही अङ्कुर का भी कर्ता हो जायगा । फिर 'अंकुर अकर्तृक है,' तुम्हारा यह कथन असङ्गत हो जायगा । 'उपादान-गोचर-अपरोक्ष-ज्ञानादिमान् ही कर्ता होता है और अंकुर का उपादान-गोचर अपरोक्षज्ञान जीव को नहीं है, अतः जीव अंकुर का कर्ता नहीं है', यह तो अचेतन को कर्ता माननेवाले आप नहीं कह सकते । यदि सेश्वरवाद मानें, तो ईश्वररूप कर्ता के व्यापार के विषय तो सभी कारक होते हैं । अतः सम्पूर्ण कारक करण हो जायेंगे । यदि कहें कि ठीक है, कारणमात्र करण ही है, तो 'कारणं करणम्' यही लक्षण करें, व्यर्थ ही विशेषण का पूरण-प्रयास क्यों करते हैं ? समर्थन—यह विशेषण कर्ता, कर्म आदि अन्य कारकों की व्यावृत्ति के लिए नहीं हैं, किन्तु एक ही कारक की रूप भेद ( प्रवृत्तिनिमित्त ) से करणपद-वाच्यता प्रदर्शन करने के लिए है । खंडन—तब तो लक्षण की निरुक्ति में प्रवृत्त आपने 'तत्क्रिया का हेतु तथा तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय तत्क्रिया का करण है' इस कथन द्वारा प्रवृत्ति- निमित्त ही कहा । एवञ्च प्रश्न का उत्तर न देकर अप्रस्तुत का अभिधान करने से अर्थान्तर

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