खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्त्येव कर्मण्यपि तेन रूपेणेति चेन्न । न तावदयं शक्योपदर्शनोदाहरणः शास्त्रलोकयोः । क्व दृश्यते 'घटं पश्यती'त्यर्थे 'घटेन पश्यती'ति । यदि तु त्वच्चेतसि केवलं स्यात्, तन्न च नादरं विधातुमुत्सहामहे । प्रमेयमात्रं करणमिति वदतो वामबुद्धेर्मनसि विपरिवर्तमानं प्रमेयमात्र एव करणव्यवहारास्तित्वमेव- मनुरोद्धव्यं स्यादिति । 'घटेन पश्यती'त्याद्यनभिधानवशान्न प्रयोगः, न हि सर्वं लाक्षणिकं प्रयुज्यत इति चेन्न माऽस्तु, तदभावे काऽन्याऽस्ति तेषु करणव्यवहार इति वक्तव्यः स स्यात्, न चासौ शक्यदर्शन इति । क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धि करणमित्यपि न । तथा हि—अयोग- व्यवच्छेदो योग एव पर्यवस्येदित सम्बन्धेन सम्बन्धीत्युक्तं स्यादिति पौनरुक्त्यम् । समर्थन—कर्म में भी कर्तृव्यापार-विषयत्वरूप से करणत्व-व्यवहार होता ही है । खण्डन—नहीं, लोक या वेद में कहीं भी 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार नहीं देखा गया है । यदि केवल आपके चित्त में 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार हो, तो उसका आदर करने में हमें उत्साह नहीं होता । कारण यदि आपके वचन का आदर करें, तो 'प्रमेयमात्र करण है' यह कहनेवाले वामबुद्धि आपके वचन का आदरकर प्रमेयमात्र को करण मानना पड़ेगा । समर्थन—अभिधान न होने से 'घटेन पश्यति' यह प्रयोग नहीं होता । कारण यह निश्चय नहीं है कि लक्षण से युक्त या सिद्ध सबका प्रयोग हो । खंडन—कर्म में करण शब्द या विभक्ति का प्रयोग न होने पर उसमें करणत्वप्रयुक्त कौन-सा व्यव- हार होता है, यह कहना होगा किन्तु आप उसको कह नहीं सकते । समर्थन—जो कुठारादि प्रधान क्रिया ( छिदादिरूप फल ) से अयोगव्यवच्छेद ( सम्बन्धाभावका अभाव ) द्वारा सम्बद्ध हो, वह करण है । कुठार का व्यापार होने पर छेदन अवश्य होता है, अतः कुठार में छेदन के अयोग का व्यवच्छेद है । कर्ता का व्यापार होने पर भी सम्भव है कि कदाचित् छेदन न हो । अतः कर्ता में छेदन का सम्बन्ध तो है, किन्तु छिदा के अयोग का व्यवच्छेद नहीं है, इसलिए न कुठार में अव्याप्ति है और न कर्ता में अतिव्याप्ति । खंडन—अभाव का अभाव प्रतियोगि- रूप होता है । अतः अयोग का व्यवच्छेद योगरूप होने से उक्त लक्षणवाक्य का अर्थ हुआ सम्बन्धयुक्त सम्बन्धी । फलतः पुनरुक्तिदोष होने से उक्त लक्षण असङ्गत है ।